अखंड ब्रह्मचारी श्रीकृष्ण और गोपियों की लीला: एक भक्ति और वेदांत की कथा

अखंड ब्रह्मचारी श्रीकृष्ण और गोपियों की लीला: एक भक्ति और वेदांत की कथा

अखंड ब्रह्मचारी श्रीकृष्ण और गोपियों की लीला: एक भक्ति और वेदांत की कथा

अखंड ब्रह्मचारी श्रीकृष्ण और गोपियों की लीला
एक बार रासलीला के समय, श्रीकृष्ण गोपियों संग नित्य आनंदमग्न होकर रात्रि में प्रकट होते और प्रत्येक गोपी को उसकी भावना के अनुरूप सुख प्रदान करते। कोई उन्हें प्रीतम भाव से भजती, तो कोई कांत भाव से। एक रात्रि, सभी गोपियाँ श्रीकृष्ण की प्रतीक्षा कर रही थीं, परंतु बहुत देर हो गई। श्रीकृष्ण नहीं आए।

गोपियों ने श्रीकृष्ण से पूछा, “आज देर क्यों हो गई, सरकार?”
प्रभु बोले, “आज मेरे गुरुजी आए थे।”
गोपियाँ चकित हो गईं, “आपके गुरुजी? कौन?”
“दुर्वासा ऋषि। वो यमुना के पार पधारे हैं,” श्रीकृष्ण बोले।

गोपियाँ आनंदित हो गईं और बोलीं, “तो हम भी आपके गुरुजी के दर्शन करेंगे। लेकिन खाली हाथ नहीं जाना चाहिए।”
शास्त्रों में कहा गया है: पत्रं पुष्पं फलं तोयं…
गोपियों ने कहा, “हम साधारण भोग नहीं ले जाएँगी, हम तो गुलाब जामुन, खीर, पूरी और अन्य पकवान बनाएँगी।”

वे बड़े उत्साह से भोग बनाकर दुर्वासा ऋषि के पास जाने लगीं। परंतु यमुना में जल अधिक था, रात का समय था और नाविक भी नहीं था।

श्रीकृष्ण ने कहा:
“यमुना जी से कहना, यदि मैं अखंड ब्रह्मचारी हूँ तो जल हट जाए।”
गोपियाँ मुस्काई। वे प्रभु की लीलाओं से परिचित थीं, लेकिन जैसे ही उन्होंने कहा, यमुना जी का जल विभक्त हो गया और मार्ग मिल गया।

दुर्वासा जी ने गोपियों द्वारा लाया सारा भोग सप्रेम स्वीकार किया – और सब खा गए!
अब वापसी में समस्या हुई – यमुना कैसे पार करें?

दुर्वासा जी ने कहा,
“यमुना से कहो – यदि मैंने कभी दूर्वा अंकुर के रस के सिवा अपनी जिह्वा पर कुछ भी नहीं रखा, तो मार्ग दे देना।”

गोपियाँ हँस पड़ीं: “गुरु-चेला दोनों ही झूठे हैं।”
लेकिन जैसे ही दुर्वासा जी का वाक्य यमुना जी से कहा, जल फिर विभक्त हो गया।

वापस आकर गोपियाँ श्रीकृष्ण से बोलीं,
“प्रभु! गुरु-चेला दोनों बड़े चतुर निकले। आपने स्वयं गोपियों के साथ क्रीड़ा की, और आपके गुरुजी पूरा भोग खा गए – फिर भी दोनों ‘अखंड ब्रह्मचारी’ और ‘उपवासरत महात्मा’ कैसे हुए?”

श्रीकृष्ण मुस्कराकर बोले:
“हम आत्मा नहीं, परमात्मा हैं। जैसे बच्चा शीशे में अपने ही प्रतिबिंब से खेलता है, वैसे ही मैं सभी गोपियों, उनके पतियों और इस जगत की आत्माओं में स्वयं से ही क्रीड़ा करता हूँ। मैं भोक्ता नहीं, साक्षी हूँ। जो कुछ हुआ, वह लीला थी – मेरा कर्म नहीं। इसलिए मेरा ब्रह्मचर्य अखंड है और मेरे गुरु का उपवास सत्य है।”

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