सच्चा सुख धन, परिवार या वैभव में नहीं, बल्कि विवेक, ज्ञान और भगवान से जुड़ने में है। जानिए सुख-दुख का वास्तविक अर्थ।
सुख और दुख का वास्तविक अर्थ
“सुख किसे कहते हैं और दुख किसे कहते हैं?”
मूर्खता ही दुख है और विवेक तथा ज्ञान ही सुख है।
जिसके पास विवेक है, ज्ञान है और संतोष है,
वह किसी भी परिस्थिति में दुखी नहीं रह सकता।
Table of Contents
विवेक और संतोष का महत्व
यदि मनुष्य के पास विवेक हो और वह संतुष्ट हो,
तो उसके पास बाहरी साधन हों या न हों
उसकी आत्मा प्रसन्न रहती है।
ऐसे संत भी देखे गए हैं
जिनके पास वस्त्र तक नहीं होते,
फिर भी देवराज इंद्र तक उनकी सेवा के लिए लालायित रहते हैं।
दिगंबर संतों से मिलने वाली सीख
दिगंबर संत जिनके पास न धन है, न वस्त्र हैं, न कोई वैभव
फिर भी उन्हें देखकर हमारे हाथ अपने आप जुड़ जाते हैं,
हम श्रद्धा से झुक जाते हैं
और उनके दर्शन मात्र से मन आनंदित हो जाता है।
यदि हमें उन्हें देखकर इतनी प्रसन्नता होती है,
तो सोचिए
वे स्वयं कितने आनंद में रहते होंगे।
क्या वैभव से सुख मिलता है?
अक्सर मनुष्य समझता है कि सुख मिलेगा:
- धन से
- सुंदर स्त्री या पुरुष से
- बड़ा परिवार होने से
- प्रतिष्ठा और वैभव से
लेकिन यह सब क्षणिक है।
इनसे मिलने वाला आनंद स्थायी नहीं होता।
सच्चा सुख केवल वहीं है
जहाँ मन भगवान से जुड़ जाता है।
शास्त्रों में कहा गया है
“ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ्क्षति।”
जो भगवान में चित्त जोड़ लेता है,
वह न शोक करता है, न इच्छा करता है।
वह सदा प्रसन्न रहता है।
निष्कर्ष
सुख वस्तुओं से नहीं, विवेक से मिलता है।
सुख धन से नहीं, संतोष से मिलता है।
और सच्चा सुख केवल भगवान से जुड़ने पर मिलता है।
जो यह समझ गया, वह जीवन की सबसे बड़ी परीक्षा में सफल हो गया।





Leave a Reply