श्री सुधनवा जी की कथा भक्तों के जीवन में भक्ति, विश्वास और समर्पण की प्रेरणा है। जानिए इस अद्भुत कथा को विस्तार से।
श्री सुधनवा जी की कथा भक्तों का जीवन केवल प्रेरणा नहीं, भगवान की महिमा का साक्षात प्रमाण होता है। सुधनवा जी की कथा यह सिद्ध करती है कि जो भक्त अनन्य भाव से श्रीकृष्ण का नाम जपता है, उसकी रक्षा स्वयं भगवान करते हैं। यह कथा भक्ति, त्याग, वीरता, और नाम महिमा का अद्भुत संगम है। “भक्त के मुख से यदि प्रभु का नाम चलता रहे, तो वह अपराजेय बन जाता है।”
इस कथा में:
हंसध्वज राजा और भक्त श्री सुधनवा जी का परिचय
चंपापुरी नामक राज्य के राजा हंसध्वज धार्मिक, धर्मपरायण और न्यायप्रिय राजा थे। उनके पुत्र सुधनवा भी बचपन से ही भगवान श्रीकृष्ण के अनन्य भक्त थे।
सुधनवा दिन-रात “श्रीकृष्ण, श्रीकृष्ण” नाम का जप करते रहते थे। वे केवल योद्धा ही नहीं, बल्कि एक महान नाम-साधक भी थे।
अश्वमेध यज्ञ और अर्जुन से युद्ध की कामना
एक दिन युधिष्ठिर महाराज के अश्वमेध यज्ञ का यज्ञीय अश्व चंपापुरी की सीमा में प्रवेश कर गया।
राजा हंसध्वज ने घोड़े को पकड़ने का आदेश दिया। यह यज्ञीय परंपरा थी जो राज्य घोड़े को पकड़ता, उसे पांडवों से युद्ध करना होता।
सुधनवा ने इस अवसर को प्रभु दर्शन के रूप में देखा। उनका उद्देश्य था अर्जुन से युद्ध कर, श्रीकृष्ण के दर्शनों को प्राप्त करना। उन्होंने अपनी माता, बहन और नवविवाहिता पत्नी प्रभावती से विदा ली और युद्ध की तैयारी की।
विलंब, राजाज्ञा और उबलते तेल की सजा
राजाज्ञा के अनुसार सभी सैनिक समय पर पहुंचे, पर सुधनवा कुछ विलंब से पहुंचे। राजा हंसध्वज क्रोधित हो उठे।
पुरोहितों शंख और लिखित के षड्यंत्र से राजा ने आदेश दिया कि सुधनवा को खौलते तेल के कड़ाह में डाल दिया जाए।
जब सुधनवा को उबलते हुए तेल में डाला गया, तो वह चमत्कार घटित हुआ श्रीकृष्ण नाम के प्रभाव से तेल में भी सुधनवा अडिग, शांत और सुरक्षित रहे।
श्रीकृष्ण नाम की महिमा
सभी लोग आश्चर्यचकित रह गए। सुधनवा का शरीर अछूता रहा। तेल उबल रहा था, पर वह नहीं जले।
जिसके मुख में श्रीकृष्ण नाम हो, उस पर कोई शक्ति प्रभाव नहीं कर सकती। आचार्य शंख और लिखित को अपनी गलती का भान हुआ और उन्होंने सुधनवा से क्षमा मांगी।
राजा हंसध्वज ने सुधनवा को सेनापति नियुक्त किया और युद्ध आरंभ हुआ।
अर्जुन और सुधनवा का महासंग्राम
युद्ध क्षेत्र में सुधनवा ने असंख्य महारथियों को हराकर अर्जुन तक पहुँच बनाई।
दोनों के बीच भीषण युद्ध हुआ।
हे पार्थ! तुम्हारी विजय का कारण श्रीकृष्ण हैं। यदि वह तुम्हारे सारथी नहीं हैं, तो तुम मुझसे नहीं जीत सकते।
अर्जुन ने दिव्य अस्त्र चलाए, पर सुधनवा ने उन्हें तिल-तिल कर काट डाला।अर्जुन चकित रह गए।
श्रीकृष्ण का आगमन
अर्जुन ने जब श्रीकृष्ण को स्मरण किया, तो प्रभु स्वयं रथ के सारथी बनकर पहुंचे।
सुधनवा का मनोभाव सफल हुआ – उन्हें प्रभु के दर्शन प्राप्त हुए।
सुधनवा ने कहा: मेरी कामना पूर्ण हुई। अब युद्ध का परिणाम चाहे जो हो, मैंने प्रभु को देख लिया।
अर्जुन ने श्रीकृष्ण की दिव्य शक्तियों से युक्त बाण चलाया। सुधनवा ने उसे भी टुकड़े-टुकड़े कर दिया। परंतु बाण का अग्र भाग सुधनवा का मस्तक काट ले गया।
चमत्कार:
कटे मस्तक से भी “जय श्रीकृष्ण” की ध्वनि निकल रही थी।
भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं उनका सिर उठाया और हृदय से लगाकर कहा:
ऐसा भक्त न कभी हुआ, न होगा।
सुधनवा की ज्योति भगवान के चारों ओर परिक्रमा कर प्रभु में लीन हो गई।
भगवान ने राजा हंसध्वज से कहा:
वह मेरे परम धाम को गया है। ऐसे भक्तों पर शोक नहीं, उत्सव मनाया जाता है।
निष्कर्ष
सुधनवा जी की यह कथा केवल एक वीरता की कहानी नहीं, बल्कि श्रीकृष्ण नाम की अपार महिमा का प्रमाण है।
सत्य निष्ठा, भक्ति और प्रेम से जो नाम जप करता है, वह अद्भुत चमत्कारों का अनुभव करता है।
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श्री सुधनवा जी के बारे में अधिक जानने के लिए Wikipedia पर पढ़ें।





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