श्री सनातन गोस्वामी जी की 5 चमत्कारी कथाएं | अद्भुत भक्ति और समर्पण की प्रेरणा

श्री सनातन गोस्वामी जी की 5 चमत्कारी कथाएं | अद्भुत भक्ति और समर्पण की प्रेरणा

श्री सनातन गोस्वामी जी की 5 चमत्कारी कथाएं | अद्भुत भक्ति और समर्पण की प्रेरणा

सनातन गोस्वामी जी की जीवन कथा भक्तों के लिए प्रेरणास्त्रोत है। जानिए कैसे उन्होंने भक्ति, सेवा और समर्पण से दिव्यता को पाया।

वृंदावन धाम, जहां हर कण में श्रीकृष्ण की लीलाएं गूंजती हैं, वहीं एक दिन श्री सनातन गोस्वामी जी को एक दिव्य अनुभव हुआ। महावन में कुछ गोप बालकों के साथ खेलते हुए एक श्याम सुंदर बालक ने उनकी ओर प्रेम से तिरछी चितवन डाली। यह दर्शन इतना मोहक था कि सनातन जी उसी क्षण उसकी ओर दौड़ पड़े, परंतु जैसे ही उन्होंने उस बालक को हृदय से लगाने का प्रयास किया, वह अदृश्य हो गया।

श्री सनातन गोस्वामी जी और श्री मदन मोहन जी की लीला कथा

भक्ति-विभोर सनातन जी रोते-रोते थक गए और झपकी में फिर वही बालक दिखाई दिया। उसने कहा, “मैं मथुरा में परशुराम चौबे के घर रहता हूं, मुझे वहां से ले आओ।”

प्रभात होते ही वे मथुरा पहुंचे और देखा वही दिव्य बालक श्री मदन मोहन जी सिंहासन पर विराजमान हैं! तब से वे हर दिन मधुकरी लेने के बहाने वहां जाने लगे। एक वृद्धा माता ने कहा, “ये ठाकुर तो सब कुछ छीन लेते हैं। जब से आए हैं, सब कुछ नष्ट हो गया।”

सनातन जी ने उत्तर दिया, “जब से इनकी दृष्टि हुई है, मेरा सब नाश हो गया राजपद, ऐश्वर्य, परिवार सब गया, अब भय किसका?” अंततः वह वृद्धा स्वयं प्रसन्न होकर ठाकुर जी को सनातन जी को सौंप देती हैं।

ठाकुर जी का प्रेम और वैराग्य की परीक्षा

श्री सनातन जी ने श्री मदन मोहन जी को आदित्य टीला पर स्थापित किया और वैराग्यपूर्ण जीवन जीते रहे। एक दिन ठाकुर जी बोले, “बाबा, यह सूखी बाटी गले से नहीं उतरती, थोड़ा नमक डाल दिया करो।”

सनातन जी मुस्कराए और कहा, “आपका स्वभाव चटोरा है, घी और बूरा भी मांगोगे, मैं महाप्रभु की आज्ञा से वैराग्य से रहूंगा।”

ठाकुर जी बोले, “तो फिर मैं अपनी व्यवस्था स्वयं कर लूं?”

सनातन जी ने सहर्ष अनुमति दी। तब एक व्यापारी रामदास कपूर जी की नाव यमुना किनारे फंस गई। स्वयं ठाकुर जी गोप बालक के रूप में प्रकट हुए और उन्हें सनातन गोस्वामी जी की शरण में भेजा। सनातन जी ने ठाकुर जी की ओर संकेत किया और रामदास जी ने प्रण किया: “यदि नाव निकलेगी, तो मंदिर और भोग की समस्त व्यवस्था कर दूंगा।” उसी क्षण नाव चल पड़ी। बाद में उसी स्थान पर श्री मदन मोहन जी का लाल पत्थर का भव्य मंदिर बनवाया गया।

पारस मणि और श्रीकृष्ण की श्रेष्ठता

एक दिन एक निर्धन ब्राह्मण भगवान शिव की आराधना कर पारस मणि की खोज में सनातन जी के पास आए। सनातन जी ने हँसते हुए कहा — “हाँ है, यमुना की रेत में कहीं पड़ी होगी।”

ब्राह्मण को वह मणि मिल गई और उन्होंने जांच कर ली कि वह असली पारस मणि है। परंतु वह चकित हुए कि इतनी अमूल्य वस्तु को सनातन जी ने तिरस्कार क्यों किया?

जब उन्होंने सनातन जी से यह पूछा, तो उन्होंने उत्तर दिया:
“यह पारस मणि बहुत दोषयुक्त है — इससे अहंकार, मोह, लोभ बढ़ते हैं। हमारे पास तो इससे भी श्रेष्ठ इंद्रनील मणि है — श्री श्याम सुंदर स्वयं।”

तब ब्राह्मण ने पारस मणि यमुना में फेंकी और सनातन जी से दीक्षा लेकर श्रीकृष्ण भक्ति में लीन हो गए।

श्री सनातन गोस्वामी जी का प्रेम और विरक्ति

सनातन गोस्वामी जी वृद्धावस्था में भी प्रतिदिन गोवर्धन परिक्रमा करते थे। जब शरीर अशक्त हो गया, तब स्वयं श्री ठाकुर जी ने उन्हें एक चरणचिह्न अंकित शिला दी और कहा, “इसकी परिक्रमा करने से संपूर्ण गोवर्धन परिक्रमा का फल मिलेगा।” यह शिला आज भी श्री राधा दामोदर मंदिर में विद्यमान है।

उनका जीवन समर्पण, सेवा, और वैराग्य का अनुपम उदाहरण है।

निष्कर्ष: प्रेम और वैराग्य की परम साधना

श्री सनातन गोस्वामी जी की कथा हमें यह सिखाती है कि जब ठाकुर जी की कृपा होती है, तो लौकिक सुख-दुख तुच्छ लगते हैं। ठाकुर जी के प्रेम में एक ऐसी शक्ति है, जो संसार के सभी बंधनों को काट देती है और भक्ति की अखंड लहर में बहा ले जाती है।

आप श्री सुधनवा जी की कथा भी पढ़ सकते हैं जो भक्तिभाव की उत्कृष्ट मिसाल है।

श्री सनातन गोस्वामी जी के बारे में अधिक जानकारी के लिए Wikipedia लेख देखें।

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