श्री भागमती बाई एक ऐसी राजरानी जिनका जीवन सांसारिक वैभव से भरा था, फिर भी उन्होंने भक्ति और समर्पण को चुना। जानिए उनकी चमत्कारी कथा और आध्यात्मिक यात्रा।
भक्तों की कथाएँ केवल इतिहास नहीं होतीं, वे मार्गदर्शक होती हैं। ऐसी ही एक अनुपम कथा है श्री भागमती बाई की एक राजरानी जिनका जीवन सांसारिक वैभव में होते हुए भी राधा रानी की सेवा में समर्पित हो गया। यह कथा भक्तिन के त्याग, प्रेम और आत्मसमर्पण की ऐसी मिसाल है जो आज भी साधकों के लिए दीपक समान है।
इस कथा में:
श्री भागमती बाई की प्रारंभिक भक्ति वृत्ति
ओरछा राज्य की रानी भागमती जी बचपन से ही संतों की सेवा और सत्संग में रची-बसी थीं। संतों की जूठन, उनके वचनों का रसास्वादन और भगवत चर्चा ने उनके भीतर गहरी भक्ति का बीज बो दिया था। विवाह के बाद जब वह राजा चिंतामणि के साथ महल में आईं, तब भी उन्होंने अपनी भक्ति को विषय-वासनाओं से प्रभावित नहीं होने दिया।
भक्ति मार्ग में श्री भागमती बाई का योगदान : नागरी दास जी संग मिलन और जीवन परिवर्तन
एक दिन उन्हें ज्ञात हुआ कि वृंदावन के परम रसिक महापुरुष नागरी दास जी उनके नगर में पधारे हैं। उनके दर्शन और वचनों से भागमती बाई का हृदय झूम उठा। उन्होंने पूर्ण आत्मसमर्पण कर कहा –
अब मेरे जीवन का एकमात्र उद्देश्य है राधा किशोरी के श्री चरणों की दासता।
नागरी दास जी ने उन्हें वृंदावन जाकर महाप्रभु हरिवंश चंद्र जी के पुत्र से दीक्षा लेने का उपदेश दिया। भागमती जी बिना किसी की अनुमति लिए वृंदावन चली गईं। वहां आचार्य चरणों से दीक्षा लेकर, ब्रज बालाओं और ब्रजवासियों की सेवा कर उन्होंने रसिक मार्ग में प्रवेश किया।
विपरीत परिस्थितियों में भी अडिग भक्ति
जब राजा को भागमती बाई के वृंदावन जाने की जानकारी मिली, तो वह क्रोधित हो गया। उसने एक पहर तक रानी को चाबुक से पीटा, लेकिन रानी के मुख से एक आह तक नहीं निकली — क्योंकि उनका चित्त राधा वल्लभ जी के चिंतन में डूबा था।
मारत हाथ थके बहु सत, तिय तन बदन विकासत।
फिर राजा ने उनका और भी अपमान किया रानी को सैया बना कर स्वयं और दूसरी रानी इंदुमती को उनके ऊपर बिठाया। परंतु रानी का मन तब भी प्रेममय भजन में ही लीन रहा।
भगवान का न्याय और राजा का परिवर्तन
प्रभु के भक्त का अपमान कभी अकारण नहीं जाता। राजा और छोटी रानी दोनों भयंकर रोगों से पीड़ित हो गए। त्वचा उधड़ने लगी, उल्टियां होने लगीं। वैद्य, औषधि कुछ काम न आई। तब किसी ने सुझाव दिया —
यदि आप बचना चाहते हैं, तो भागमती जी के चरण पकड़ लीजिए।
दोनों उनके चरणों में गिर पड़े। रानी ने क्षमा करते हुए कहा:
आप हमारे राधा वल्लभ लाल जी की शरण में आइए। वहीं आपको शांति मिलेगी।
राजा ने उनकी बात मानी, वृंदावन आए, दीक्षा ली और भक्त जीवन में रंग गए।
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निष्कर्ष: भक्ति स्वयं प्रमाण है
यह कथा केवल भागमती बाई की नहीं है, यह हर उस साधक की कथा है जो भक्ति में डूबना चाहता है। जब मनोभाव शुद्ध होता है, तब न विपत्ति बाधक बनती है, न अपमान क्योंकि हृदय में केवल राधा किशोरी का ही निवास होता है।
ना पारम महेन्द्र पदं, ना योगसिद्धि, ना मोक्ष की कामना केवल प्यारी जू के प्रेम रस में डूबना ही सच्ची भक्ति है।
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