शिव तांडव स्तोत्र भगवान शिव की महिमा, उनके तांडव नृत्य और उनके उग्र-करुणामय स्वरूप का अद्भुत स्तुतिगान है। इस स्तोत्र की रचना लंकापति रावण द्वारा की गई मानी जाती है। यह स्तोत्र शक्ति, भक्ति, वैराग्य और शिव-तत्व का गहन अनुभव कराता है।
जो भक्त श्रद्धा और भाव से इसका पाठ करता है, उसके जीवन में साहस, स्थिरता और मानसिक शक्ति का संचार होता है।
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॥ श्लोक 1 ॥
जटाटवीगलज्जलप्रवाहपावितस्थले
गलेऽवलम्ब्य लम्बितां भुजङ्गतुङ्गमालिकाम्।
डमड्डमड्डमड्डमन्निनादवड्डमर्वयं
चकार चण्डताण्डवं तनोतु नः शिवः शिवम्॥
हिंदी अर्थ
जिनकी जटाओं से बहने वाली गंगा पृथ्वी को पवित्र करती है,
जिनके गले में विशाल सर्प सुशोभित है,
जिनके डमरू की ध्वनि से आकाश गूंज उठता है,
वे भगवान शिव अपने उग्र तांडव से हमारा कल्याण करें।
॥ श्लोक 2 ॥
जटाकटाहसम्भ्रमभ्रमन्निलिम्पनिर्झरी
विलोलवीचिवल्लरीविराजमानमूर्धनि।
धगद्धगद्धगज्ज्वलल्ललाटपट्टपावके
किशोरचन्द्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं मम॥
हिंदी अर्थ
जिनकी जटाओं में गंगा की लहरें शोभित हैं,
जिनके ललाट पर प्रज्वलित अग्नि जल रही है,
और जिनके मस्तक पर चंद्रमा विराजमान है
उन शिव में मेरा मन निरंतर रमा रहे।
॥ श्लोक 3 ॥
धराधरेन्द्रनन्दिनीविलासबन्धुबन्धुर
स्फुरद्दिगन्तसन्ततिप्रमोदमानमानसे।
कृपाकटाक्षधोरणीनिरुद्धदुर्धरापदि
क्वचिद्दिगम्बरे मनो विनोदमेतु वस्तुनि॥
हिंदी अर्थ
जो पार्वती के प्रिय हैं,
जिनकी कृपा से भक्तों का मन आनंदित होता है,
जो कठिन संकटों को नष्ट करने वाले हैं,
वे दिगंबर शिव मेरे मन को आनंद प्रदान करें।
॥ श्लोक 4 ॥
जटाभुजङ्गपिङ्गलस्फुरत्फणामणिप्रभा
कदम्बकुङ्कुमद्रवप्रलिप्तदिग्वधूमुखे।
मदान्धसिन्धुरस्फुरत्त्वगुत्तरीयमेदुरे
मनो विनोदमद्भुतं बिभर्तु भूतभर्तरि॥
हिंदी अर्थ
जिनके सर्पों के फणों की मणियाँ चमक रही हैं,
जिनकी देह पर भस्म और कुंकुम सुशोभित है,
जो समस्त भूतों के स्वामी हैं
वे शिव मेरे मन को अद्भुत आनंद दें।
॥ श्लोक 5 ॥
सहस्रलोचनप्रभृत्यशेषलेखशेखर
प्रसूनधूलिधोरणी विधूसराङ्घ्रिपीठभूः।
भुजङ्गराजमालया निबद्धजाटजूटक
श्रियै चिराय जायतां चकोरबन्धुशेखरः॥
हिंदी अर्थ
जिनके चरणों की धूल से देवता भी पवित्र होते हैं,
जिनके सिर पर चंद्रमा विराजमान है,
जो नागों की माला धारण करते हैं
वे शिव हमें दीर्घकाल तक मंगल प्रदान करें।
॥ श्लोक 6 ॥
ललाटचत्वरज्वलद्धनञ्जयस्फुलिङ्गभा
निपीतपञ्चसायकं नमन्निलिम्पनायकम्।
सुधामयूखलेखया विराजमानशेखरं
महाकपालिसम्पदे शिरोजटालमस्तु नः॥
हिंदी अर्थ
जिनके ललाट की अग्नि ने कामदेव को भस्म कर दिया,
जो देवताओं द्वारा पूजित हैं,
जो महाकपाली हैं
वे शिव हमें ऐश्वर्य प्रदान करें।
॥ श्लोक 7 ॥
करालभालपट्टिकाधगद्धगद्धगज्ज्वल
द्धनञ्जयाधरीकृतप्रचण्डपञ्चसायकम्।
धराधरेन्द्रनन्दिनीकुचाग्रचित्रपत्रक
प्रकल्पनैकशिल्पिनि त्रिलोचने रतिर्मम॥
हिंदी अर्थ
जिन्होंने कामदेव को नष्ट किया,
जो पार्वती के वक्षस्थल को सुशोभित करते हैं,
जो त्रिनेत्रधारी हैं
उन शिव में मेरी भक्ति बनी रहे।
॥ श्लोक 8 ॥
नवीनमेघमण्डली निरुद्धदुर्धरस्फुरत्
कुहूनिशीथिनीतमः प्रबन्धबन्धुकन्धरः।
निलिम्पनिर्झरीधरस्तनोतु कृत्तिसिन्धुरः
कलानिधानबन्धुरः श्रियं जगद्धुरन्धरः॥
हिंदी अर्थ
जो मेघों के समान श्याम हैं,
जो गंगा को धारण करते हैं,
जो कला और सौंदर्य के भंडार हैं
वे शिव जगत का कल्याण करें।
॥ श्लोक 9 ॥
प्रफुल्लनीलपङ्कजप्रपञ्चकालिमप्रभा
विलम्बिकण्ठकन्दलीरुचिप्रबद्धकन्धरम्।
स्मरच्छिदं पुरच्छिदं भवच्छिदं मखच्छिदं
गजच्छिदान्धकच्छिदं तमन्तकच्छिदं भजे॥
हिंदी अर्थ
जो काम, त्रिपुर, अंधक और यम का नाश करने वाले हैं,
जो समस्त भय को हर लेते हैं
मैं उन शिव की उपासना करता हूँ।
॥ श्लोक 10 ॥
अखर्वसर्वमङ्गलाकलाकदम्बमञ्जरी
रसप्रवाहमाधुरीविजृम्भणामधुव्रतम्।
स्मरान्तकं पुरान्तकं भवान्तकं मखान्तकं
गजान्तकान्धकान्तकं तमन्तकान्तकं भजे॥
हिंदी अर्थ
जो समस्त मंगल कलाओं के स्रोत हैं,
जो अधर्म और अहंकार का नाश करते हैं
मैं उन शिव को नमन करता हूँ।
॥ श्लोक 11 ॥
जयत्वदभ्रविभ्रमभ्रमद्भुजङ्गमश्वस
द्विनिर्गमत्क्रमस्फुरत्करालभालहव्यवाट्।
धिमिद्धिमिद्धिमिद्ध्वनन्मृदङ्गतुङ्गमङ्गल
ध्वनिक्रमप्रवर्तितप्रचण्डताण्डवः शिवः॥
हिंदी अर्थ
जिनके तांडव से दिशाएँ कंपित हो उठती हैं,
जिनके नृत्य से मंगल ध्वनि उत्पन्न होती है
वे शिव सदा विजयी हों।
॥ श्लोक 12 ॥
दृषद्विचित्रतल्पयोर्भुजङ्गमौक्तिकस्रजोर्
गरिष्ठरत्नलोष्ठयोः सुहृद्विपक्षपक्षयोः।
तृणारविन्दचक्षुषोः प्रजामहीमहेन्द्रयोः
समप्रवृत्तिकः कदा सदाशिवं भजाम्यहम्॥
हिंदी अर्थ
जो मित्र-शत्रु, रत्न-मिट्टी, राजा-प्रजा में समान भाव रखते हैं
ऐसे सदाशिव को मैं कब भजूँगा?
॥ श्लोक 13 ॥
कदा निलिम्पनिर्झरीनिकुञ्जकोटरे वसन्
विमुक्तदुर्मतिः सदा शिरःस्थमञ्जलिं वहन्।
विलोललोचनोल्लसद्भुजङ्गमौलिमालिकः
शिवेति मन्त्रमुच्चरन् कदा सुखी भवाम्यहम्॥
हिंदी अर्थ
कब मैं गंगा तट पर रहकर,
शिव मंत्र का जप करते हुए
सच्चा सुख प्राप्त करूँगा?
॥ श्लोक 14 ॥
इमं हि नित्यमेवमुक्तमुत्तमोत्तमं स्तवं
पठन्स्मरन्ब्रुवन्नरो विशुद्धिमेति सन्ततम्।
हरे गुरौ सुभक्तिमाशु याति नान्यथा गतिं
विमोहनं हि देहिनां सुशङ्करस्य चिन्तनम्॥
हिंदी अर्थ
जो व्यक्ति इस स्तोत्र का नित्य पाठ करता है,
वह पवित्र हो जाता है और
शिव भक्ति को प्राप्त करता है।
निष्कर्ष
शिव तांडव स्तोत्र
केवल स्तुति नहीं,
बल्कि जीवन को निर्भय, स्थिर और ऊर्जावान बनाने का मार्ग है।
यह सिखाता है
विनाश से मत डरो,
परिवर्तन को स्वीकार करो,
और शिव तत्व को समझो।
ॐ नमः शिवाय।





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