शिव रुद्राष्टकम का संपूर्ण पाठ और अर्थ हिंदी में। भगवान शिव की महिमा, भक्ति और कृपा का अद्भुत वर्णन तुलसीदास जी द्वारा रचित स्तुति में पढ़ें।
शिव रुद्राष्टकम एक अद्भुत और शक्तिशाली स्तुति है, जिसे गोस्वामी तुलसीदास जी ने रचा है। यह भगवान शिव की महिमा, स्वरूप और कृपा का सुंदर वर्णन करती है।
रुद्राष्टकम का पाठ करने से मन को शांति, आत्मबल और सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त होती है।
नीचे आपको इसका संस्कृत मूल श्लोक और हिंदी अर्थ (अर्थार्थ) दिया गया है, ताकि आप भावपूर्वक पाठ कर सकें।
Table of Contents
शिव रुद्राष्टकम (संस्कृत मूल)
नमामीशमीशान निर्वाणरूपं
विभुं व्यापकं ब्रह्म वेदस्वरूपम्।
निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं
चिदाकाशमाकाशवासं भजेऽहम्॥
अर्थ:
मैं ईश्वर के ईश्वर, मोक्षस्वरूप, सर्वव्यापक, ब्रह्म और वेदस्वरूप शिव को नमस्कार करता हूँ। जो स्वयं में स्थित, निर्गुण, निर्विकल्प, इच्छा रहित, चेतन आकाश के समान हैं और आकाश में वास करते हैं।
निराकारमोंकारमूलं तुरीयं
गिरा ज्ञान गोतीतमीशं गिरीशम्।
करालं महाकाल कालं कृपालं
गुणागार संसारपारं नतोऽहम्॥
अर्थ:
जो निराकार, ॐकार के मूल, चतुर्थ अवस्था (तुरिया) में स्थित, वाणी और ज्ञान से परे, पर्वतराज के स्वामी हैं।
जो महाकाल के भी काल, भयानक रूप के धारक, कृपालु, गुणों के भंडार और संसार से परे हैं उन्हें मैं नमन करता हूँ।
तुषाराद्रि संकाश गौरं गभीरं
मनः शैल राजेंद्र चूडारमण्यम्।
सुपर्णेशुनेत्रं विषालं विशालं
शिवं शान्तमीडे जगत्कारणं तम्॥
अर्थ:
जो हिमालय के समान गौरवर्ण, गहन स्वरूप वाले हैं, जिनके मस्तक पर चंद्रमा सुशोभित है, जिनके नेत्र सूर्य, चंद्र और अग्नि हैं,
जो विशाल, शांत और जगत के कारण हैं उन शिव की मैं स्तुति करता हूँ।
भवः भावनीशं सुरादीननाथं
जगन्नाथमाद्यं सदानन्दभावम्।
भवद्भव्यभूतेश्वरं भूतनाथं
शिवं शङ्करं शम्भुमीशानमीडे॥
अर्थ:
जो भव (संसार) के स्वामी, पार्वतीपति, देवताओं के नाथ, जगत के स्वामी और आद्य पुरुष हैं,
जो सदैव आनंद स्वरूप हैं, जो भूत, वर्तमान और भविष्य के ईश्वर हैं उन शिव, शंकर, शम्भु, ईशान की मैं वंदना करता हूँ।
रुद्राष्टकम पाठ का महत्व
रुद्राष्टकम का पाठ विशेष रूप से सावन मास, महाशिवरात्रि और सोमवार के दिन करना अत्यंत शुभ माना जाता है।
यह न केवल आध्यात्मिक उन्नति लाता है बल्कि मानसिक शांति, सकारात्मकता और जीवन में संतुलन भी प्रदान करता है।





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