सखी सखुबाई की चमत्कारी भक्ति – एक प्रेरणादायक सच्ची कथा

सखी सखुबाई की चमत्कारी भक्ति – एक प्रेरणादायक सच्ची कथा

सखी सखुबाई की चमत्कारी भक्ति – एक प्रेरणादायक सच्ची कथा

सखी सखुबाई की भक्ति की यह सच्ची कथा दिखाती है कि समर्पण और प्रेम से भगवान को कैसे पाया जा सकता है। पढ़ें इस प्रेरणादायक गाथा को।

सखी सखुबाई महाराष्ट्र के करहाट गांव की ये कथा एक ऐसी भक्तिन की है, जिसने हर परिस्थिति में श्रीकृष्ण का चिंतन नहीं छोड़ा। चाहे दुख की घड़ी हो या अपमान, सेवा हो या पिटाई सखुबाई नामक इस संत वधू ने कभी अपने मन में शिकायत नहीं आने दी। और अंततः श्री विट्ठल ने स्वयं उसके जीवन में अवतरण करके उसकी भक्ति को अमर बना दिया।

सखी सखुबाई का क्लेशमय गृहस्थ जीवन

करहाट गांव के एक ब्राह्मण परिवार में चार लोग थे—ब्राह्मण, उनकी पत्नी, पुत्र और पुत्रवधू सखुबाई। सखुबाई बचपन से ही भगवत भक्ति में लीन थी। परंतु उसका विवाह एक ऐसे परिवार में हुआ जहाँ सभी सदस्य दुष्ट प्रवृत्ति के थे। सास-ससुर और पति द्वारा उसे दिन-रात गालियां दी जातीं, मारपीट होती और उपेक्षा झेलनी पड़ती।

वह दिनभर सेवा करती, सबके बर्तन मांजती, कपड़े धोती, भोजन बनाती और फिर सबकी झूठन खाकर संतोष करती। मगर उसका हृदय सदा श्री कृष्ण में लगा रहता। एक पल भी भगवत स्मरण से विमुख नहीं होती।

सखी सखुबाई की अद्वितीय सहनशीलता और भक्ति

सखुबाई का त्याग और सेवा असाधारण थी। कभी किसी से शिकायत नहीं, न किसी को प्रतिकार। गांववाले देखते और तरस खाते, परंतु वह केवल अपने विट्ठल से मन में संवाद करती:
“यदि ये लोग मुझसे प्रेम करते, तो मेरा मन श्रीकृष्ण में कैसे लग पाता?”

वह दुःख को भी प्रभु की कृपा मानकर सहन करती।

पंढरपुर यात्रा की लालसा

एक बार जब पंढरपुर यात्रा का समय आया, गांव से भक्तों की मंडलियां निकलने लगीं। सखुबाई का हृदय भर आया। श्री विट्ठल के दर्शन की तीव्र इच्छा जागी। कृष्णा नदी पर जल भरने का बहाना करके वह संकीर्तन मंडली में सम्मिलित हो गई।

परंतु जब सास को पता चला, तो उसने पुत्र के साथ मिलकर सखुबाई को पकड़ लिया और मारपीट कर रस्सियों से खंभे में बांध दिया। दो सप्ताह तक बिना अन्न-जल के उसे बंधक बना दिया गया।

श्री विट्ठल का सखी रूप में आगमन

जब सखुबाई ने हृदय से पुकारा:
“हे नाथ! क्या ऐसा नहीं हो सकता कि मैं आपके दर्शन कर सकूं?”
तब श्री विट्ठल अपने भक्त की पुकार सुनकर स्वयं सखी रूप में प्रकट हुए। उन्होंने सखुबाई को मुक्त किया और स्वयं उसके स्थान पर बंध गए।

अब श्री विट्ठल ही सखुबाई के रूप में पिटते रहे, गालियां सुनते रहे, सेवा करते रहे। ये दर्शाता है कि भक्त के लिए भगवान किस सीमा तक जा सकते हैं।

सखुबाई का मिलन और अंत्येष्टि

सखुबाई भक्तों के संग पंढरपुर पहुंचीं। श्री विट्ठल के दर्शन में मग्न होकर उनके प्राण निकल गए। एक ब्राह्मण ने उनका अंतिम संस्कार भी कर दिया।

उधर रुक्मिणी जी ने इस लीला का रहस्य जानकर सखुबाई को पुनर्जीवित किया और नया शरीर प्रदान कर करहाट लौटने को कहा।

करहाट में रहस्योद्घाटन

जब सखुबाई वापस लौटीं, तो गांव के लोग चकित हो गए। खासकर वह ब्राह्मण जिसने अंत्येष्टि की थी। सखुबाई ने बताया कि श्री विट्ठल स्वयं उसके रूप में वहां सेवा कर रहे थे। यह सुनकर सास-ससुर और पति चरणों में गिर पड़े।

उन्होंने अपने कुकर्मों की क्षमा मांगी और सखुबाई के सान्निध्य में भक्ति मार्ग को अपनाया।

अंत में एक संदेश:

यदि जीवन में क्लेश हो, दुख हो, विरोध हो—तो हर्षित हो जाइए, क्योंकि हरि आने वाले हैं। भगवान हर क्षण देख रहे हैं, और सच्ची पुकार पर वे स्वयं आ जाते हैं—कभी सखी बनकर, कभी सेवक बनकर, कभी भक्त बनकर।

जय सखी सखुबाई! जय श्री विट्ठल!

सखुबाई जी की भक्ति हमें भक्त अधैया जी की कथा की याद दिलाती है, जहाँ प्रेम और भक्ति का सुंदर मिलन होता है।

सखुबाई जी के जीवन, भक्ति और उनके समर्पण के बारे में अधिक जानकारी के लिए Sant Sakhi Sakhubai – Wikipedia पेज पढ़ें।

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