सफलता और असफलता में समभाव मनुष्य का कर्तव्य है प्रयास करना, परिणाम उसके अधिकार में नहीं है।
हम यह नहीं जानते कि परमात्मा हमें क्या बनाना चाहता है, हमसे क्या करवाना चाहता है यह तो वही जाने। हमारा अधिकार केवल इतना है कि हमारा प्रयास ईमानदारी से, बिना प्रमाद, बिना आलस्य और बिना छल के हो।
समय का चक्र अटल है
यदि हम पूरी निष्ठा से कर्म कर रहे हैं और फिर भी अपेक्षित फल नहीं मिल रहा, तो उस स्थिति में असंतोष नहीं, बल्कि संतोष रखना ही साधना है। संभव है कि कोई पुराना प्रारब्ध नष्ट हो रहा हो। जो आज हमें कष्ट प्रतीत हो रहा है, वही भविष्य में आनंद का कारण बनेगा।
प्रकृति का नियम है
- दिन के बाद रात आती है
- रात के बाद दिन निश्चित है
इसी प्रकार,
- आज असफलता है तो कल सफलता अवश्य आएगी
- और यदि आज सफलता है, तो कल असफलता के लिए भी तैयार रहना होगा
जीवन सफलता और असफलता का क्रम है। जो इस क्रम को समझकर दोनों स्थितियों में समान भाव रखता है, वही वास्तव में ज्ञानी है।
समभाव ही महात्मा की पहचान है
जो व्यक्ति सफलता में अहंकार से नहीं भरता और असफलता में टूटता नहीं,
जो लाभ-हानि, जय-पराजय, सुख-दुःख इन सबमें समान रहता है,
वही वास्तव में महात्मा है।
भगवद्गीता में भी यही उपदेश दिया गया है
“सुख-दुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ”
अर्थात जो सुख और दुःख, लाभ और हानि, जय और पराजय इन सभी में समभाव रखता है, वही भगवान का सच्चा भक्त है।
निष्कर्ष
- प्रयास हमारा धर्म है
- फल भगवान की व्यवस्था
- असफलता सजा नहीं, तैयारी है
- सफलता स्थायी नहीं, परीक्षा है
जो व्यक्ति हर परिस्थिति में समभाव बनाए रखता है, वही जीवन की वास्तविक शांति और आनंद को प्राप्त करता है।





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