मनुष्य को सच्चा सुख धन, रूप और प्रतिष्ठा में नहीं, बल्कि गुरु की आज्ञा और भगवान की शरण में मिलता है। जानिए भक्ति का रहस्य।
मनुष्य को सच्चा सुख कहाँ मिलता है?
मनुष्य के जीवन में तीन ऐसी इच्छाएँ होती हैं, जिनमें उसे लगता है कि इन्हें प्राप्त करते ही वह अत्यंत सुखी हो जाएगा।
पहली — सुंदर स्त्री या सुंदर पुरुष का साथ,
दूसरी — मनोवांछित धन की प्राप्ति,
और तीसरी — नाम, प्रतिष्ठा और कीर्ति।
इन्हीं तीनों को शास्त्रों में कंचन, कामिनी और कीर्ति कहा गया है।
पूरी माया इन्हीं तीनों के इर्द-गिर्द घूमती है।
माया का भ्रम
जब तक ये चीजें हमारे पास नहीं होतीं, हमें लगता है कि इनके मिलते ही जीवन सफल हो जाएगा।
लेकिन जब ये मिल जाती हैं, तब भी मन शांत नहीं होता।
क्योंकि माया की विशेषता है —
वह कभी तृप्त नहीं करती, केवल और अधिक चाह पैदा करती है।
मन का गजराज
मन को शास्त्रों में मतवाला गजराज (हाथी) कहा गया है।
जैसे हाथी मजबूत से मजबूत जंजीर तोड़ देता है,
वैसे ही मन हर कसम, हर संकल्प और हर व्रत को तोड़ देता है।
आप चाहे किसी की भी कसम खा लें
गंगा की, राम की, हरि की या माता की
जब विषय सामने आते हैं, तो मन जबरदस्ती उधर खींच ले जाता है।
समाधान क्या है?
समाधान केवल एक है भगवान की शरण।
भगवान स्वयं कहते हैं:
“मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते”
जो मेरी शरण में आता है, वही माया को पार कर पाता है।
लेकिन भगवान की शरण सीधे नहीं मिलती।
गुरु के चरणों में चित्त लगाना क्यों आवश्यक है?
भगवान में चित्त लगाने के लिए पहले गुरु के चरणों में चित्त लगाना पड़ता है।
और गुरु के चरणों में चित्त लगाने का वास्तविक अर्थ है —
गुरु और संतों की आज्ञा का पालन करना।
जब हम गुरु की आज्ञा का पालन करते हैं,
तो हमारे भीतर आध्यात्मिक बल उत्पन्न होता है।
आध्यात्मिक बल का फल
उसी आध्यात्मिक बल से:
- मन नियंत्रित होता है
- इंद्रियाँ वश में आती हैं
- भोगों से दूरी बनती है
- और अंततः मन भगवान में लगता है
इसके बिना मन को जीतने का कोई दूसरा मार्ग नहीं है।
निष्कर्ष
धन, रूप और प्रतिष्ठा क्षणिक सुख दे सकते हैं,
लेकिन स्थायी आनंद केवल भगवान की शरण में है।
जो व्यक्ति गुरु की आज्ञा में चलता है,
वही मन पर विजय पाता है
और वही सच्चे सुख का अनुभव करता है।
भगवान को प्रणाम करें,
उनका नाम जपें,
उनमें मन लगाएँ
यही विजय का मार्ग है।





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