भारतीय इतिहास और पुराणों में अनेक राजाओं, ऋषियों और महापुरुषों की गाथाएँ हैं, परंतु महाराज रंतदेव की कथा करुणा, त्याग और निष्ठा का ऐसा दीपक है, जिसकी रोशनी आज भी मन को पवित्र कर देती है। यह कथा केवल एक राजा की नहीं, बल्कि ऐसे भक्त की है जिसने भगवान को अपनी भक्ति से खरीद लिया भगवान के अपने शब्दों में।
रंतदेव चक्रवर्ती सम्राट जो सब कुछ दान कर देते थे
रंतदेव एक महान चक्रवर्ती सम्राट थे—ऐसा राज वैभव कि जिसकी तुलना कहीं नहीं। परंतु उनका हृदय वैराग्य और दान से ओत-प्रोत था।
- जो मांगने आता, खाली हाथ कभी नहीं लौटता
- स्वयं के लिए कुछ रखना धर्मविरुद्ध मानते
- दिन-रात भगवान का स्मरण और सबके प्रति करुणा
धीर-धीरे दान करते-करते परिस्थिति ऐसी आई कि राजभवन में अनाज भी नहीं बचा। परंतु उद्योग नहीं करना, मांगना नहीं, और जो आए उसे देना है यह व्रत अटल था।
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48 दिनों का कठोर उपवास
पूरा परिवार 48 दिनों तक बिना भोजन और बिना जल के जीवित रहा। यह केवल भूख की परीक्षा नहीं थी, बल्कि निष्ठा की कसौटी थी।
49वें दिन सुबह भगवान की प्रेरणा से खीर, घी, मिठाई और जल उत्पन्न हुआ। परिवार के प्राण मानो लौट आए।
परंतु तभी… भगवान की परीक्षा प्रारंभ हुई।
अतिथि परीक्षण – दान की पराकाष्ठा
पहला अतिथि – ब्रह्मर्षि रूप में
जब भोजन पर भोग लगाने ही वाले थे, तभी एक ब्रह्मर्षि अतिथि आए।
रंतदेव ने परिवार को रोका “अतिथि देवो भव।”
सारा भोजन उन्हें दे दिया। परिवार भूखा ही रहा।
दूसरा अतिथि – दीन-दरिद्र रूप में
जो थोड़े-से कण बचे थे, वह भी एक दूसरे अतिथि ने मांग लिए।
रंतदेव ने हंसकर दे दिया।
वे कण जो प्रसाद समझकर जीभ पर रखने वाले थे, वे भी जा चुके थे…
तीसरा अतिथि – भूखा कुत्ता
अब केवल कुछ गिरा हुआ अन्न ही बचा था।
एक कुत्ता आया और बोला
“महाराज, इसे मत छूना, मुझे चाट लेने दो, मैं बहुत भूखा हूं।”
रंतदेव ने उसे भी दे दिया।
चौथा अतिथि – प्यासा चांडाल
अंत में केवल थोड़ा-सा जल बचा था।
परंतु उसे पीने से पहले एक चांडाल प्यासा पहुँचा।
रंतदेव ने जल उसे दे दिया।
अब उनके पास अपने लिए कुछ भी नहीं बचा था और 48 दिन से स्वयं जल तक नहीं पिया था।
अतिथि परीक्षण – दान की पराकाष्ठा
पहला अतिथि – ब्रह्मर्षि रूप में
जब भोजन पर भोग लगाने ही वाले थे, तभी एक ब्रह्मर्षि अतिथि आए।
रंतदेव ने परिवार को रोका “अतिथि देवो भव।”
सारा भोजन उन्हें दे दिया। परिवार भूखा ही रहा।
दूसरा अतिथि – दीन-दरिद्र रूप में
जो थोड़े-से कण बचे थे, वह भी एक दूसरे अतिथि ने मांग लिए।
रंतदेव ने हंसकर दे दिया।
वे कण जो प्रसाद समझकर जीभ पर रखने वाले थे, वे भी जा चुके थे…
तीसरा अतिथि – भूखा कुत्ता
अब केवल कुछ गिरा हुआ अन्न ही बचा था।
एक कुत्ता आया और बोला
“महाराज, इसे मत छूना, मुझे चाट लेने दो, मैं बहुत भूखा हूं।”
रंतदेव ने उसे भी दे दिया।
चौथा अतिथि – प्यासा चांडाल
अंत में केवल थोड़ा-सा जल बचा था।
परंतु उसे पीने से पहले एक चांडाल प्यासा पहुँचा।
रंतदेव ने जल उसे दे दिया।
अब उनके पास अपने लिए कुछ भी नहीं बचा था और 48 दिन से स्वयं जल तक नहीं पिया था।
रंतदेव की दिव्य प्रार्थना
प्यासे, भूखे, थके हुए रंतदेव भगवान को हृदय से पुकारते हुए बोले
“प्रभु! मैं आपसे न सिद्धियाँ चाहता हूँ, न स्वर्ग, न मोक्ष।
मुझे बस इतनी शक्ति दे दीजिए कि दुनिया का हर दुख मैं सह लूँ
और कोई भी जीव, कोई भी प्राणी दुखी न रहे।”
यह वह प्रार्थना थी जिसने सृष्टि को हिला दिया।
उसी क्षण ब्रह्मा, विष्णु, महेश और धर्म–देव स्वयं प्रकट हुए।
उन्होंने कहा
“रंतदेव! तुम्हारी अंतिम परीक्षा थी।
48 दिन के भूखे होकर भी तुमने अपने लिए कुछ नहीं रखा।
तुमने हमें खरीद लिया अपनी निष्ठा से।”
भगवान ने उन्हें वर माँगने को कहा।
रंतदेव ने कहा
“प्रभु, जब हमारी आँखों ने माया के मिथ्या स्वरूप को जान लिया है,
तो अब मांगने को कुछ नहीं बचा।”
भगवान ने प्रसन्न होकर कहा
“तुम्हारे समस्त परिवार, वंश और परिकर को मैं परमधाम देता हूँ।”
और रंतदेव पूरा परिवार सहित परमधाम को प्रस्थान कर गए।
उसी क्षण ब्रह्मा, विष्णु, महेश और धर्म–देव स्वयं प्रकट हुए।
उन्होंने कहा—
“रंतदेव! तुम्हारी अंतिम परीक्षा थी।
48 दिन के भूखे होकर भी तुमने अपने लिए कुछ नहीं रखा।
तुमने हमें खरीद लिया अपनी निष्ठा से।”
भगवान ने उन्हें वर माँगने को कहा।
रंतदेव ने कहा—
“प्रभु, जब हमारी आँखों ने माया के मिथ्या स्वरूप को जान लिया है,
तो अब मांगने को कुछ नहीं बचा।”
भगवान ने प्रसन्न होकर कहा—
“तुम्हारे समस्त परिवार, वंश और परिकर को मैं परमधाम देता हूँ।”
और रंतदेव पूरा परिवार सहित परमधाम को प्रस्थान कर गए।
इस कथा का सार
- भक्ति आसन से नहीं, त्याग से सिद्ध होती है।
- भगवान को पाने का मार्ग करुणा और निस्वार्थ सेवा है।
- यदि हृदय निर्मल हो, तो स्वयं भगवान दास बनकर खड़े हो जाते हैं।
रंतदेव की यह कथा हमें बताती है कि
सच्ची भक्ति वही है जिसमें “मैं” नहीं, केवल “तू” हो।





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