राजसूय यज्ञ और अकिंचन भक्त की महिमा: स्वपच वाल्मीकि की अद्भुत कथा

राजसूय यज्ञ और अकिंचन भक्त की महिमा: स्वपच वाल्मीकि की अद्भुत कथा

राजसूय यज्ञ और अकिंचन भक्त की महिमा: स्वपच वाल्मीकि की अद्भुत कथा

राजसूय यज्ञ में शंख क्यों नहीं बजा? जानिए अकिंचन महाभागवत स्वपच वाल्मीकि की अद्भुत भक्ति और वैष्णव अपराध से जुड़ी यह प्रेरणादायक कथा, जो सच्ची भक्ति का वास्तविक अर्थ समझाती है। सनातन धर्म में यज्ञ, तपस्या और साधना का विशेष महत्व है, किंतु इन सबसे ऊपर निष्काम और निराभिमान भक्ति को सर्वोच्च स्थान दिया गया है। राजसूय यज्ञ की यह प्रसिद्ध कथा हमें सिखाती है कि भगवान बाहरी वैभव से नहीं, बल्कि शुद्ध भाव से प्रसन्न होते हैं।

राजसूय यज्ञ और दिव्य शंख

महाराज युधिष्ठिर द्वारा आयोजित राजसूय यज्ञ में ब्रह्मा जी, भगवान शंकर और अनेक सिद्ध ऋषि-मुनि उपस्थित थे। यज्ञ स्थल पर एक दिव्य शंख रखा गया था, जिसके विषय में यह मान्यता थी कि यज्ञ की पूर्णता होते ही वह स्वयं बज उठेगा।

यज्ञ में सभी देवताओं और महापुरुषों द्वारा प्रसाद ग्रहण करने के बाद भी शंख मौन रहा। यह देखकर महाराज युधिष्ठिर चिंतित हो गए और उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण से इसका कारण पूछा।

भगवान श्रीकृष्ण का रहस्योद्घाटन

भगवान श्रीकृष्ण ने बताया कि यज्ञ अभी पूर्ण नहीं हुआ है, क्योंकि एक अकिंचन महाभागवत ने अब तक प्रसाद ग्रहण नहीं किया है

अकिंचन भक्त की पहचान

अकिंचन भक्त वह होता है

  • जिसे अपने भक्ति पर कोई अभिमान नहीं होता
  • जो स्वयं को कुछ नहीं मानता
  • जो हर परिस्थिति में केवल भगवान का स्मरण करता है

स्वपच वाल्मीकि: गुप्त और महान भक्त

भगवान श्रीकृष्ण ने बताया कि युधिष्ठिर के द्वार पर प्रतिदिन आने वाला झाड़ू लगाने वाला स्वपच वाल्मीकि ही वह अकिंचन महाभागवत है।

अर्जुन और भीम का स्वपच वाल्मीकि से मिलन

अर्जुन और भीम जब उन्हें निमंत्रण देने पहुँचे, तो उन्होंने देखा कि स्वपच वाल्मीकि

  • एक हाथ में झाड़ू और दूसरे हाथ में डलिया लिए हुए थे
  • निरंतर “हा कृष्ण, हा कृष्ण” का जप कर रहे थे
  • पूर्णतः विनम्र और दीन भाव में लीन थे

वे स्वयं को राजसूय यज्ञ के योग्य नहीं मानते थे, किंतु भगवान की आज्ञा मानकर यज्ञ में आने को तैयार हो गए।

स्वपच वाल्मीकि को पालकी में बैठाकर सम्मानपूर्वक यज्ञ स्थल लाया गया। द्रौपदी जी ने स्वयं उनके लिए भोजन तैयार किया।

अनजाने में हुआ वैष्णव अपराध

प्रसाद परोसते समय द्रौपदी जी के मन में एक क्षण के लिए यह विचार आया कि “ये स्वाद को क्या जानेंगे,” और उन्होंने सभी व्यंजनों को एक साथ मिला दिया। यह भाव वैष्णव के प्रति तिरस्कार का था।

स्वपच वाल्मीकि ने प्रेमपूर्वक प्रसाद ग्रहण किया, फिर भी शंख नहीं बजा। भगवान श्रीकृष्ण ने बताया कि यज्ञ में वैष्णव अपराध हो गया है। द्रौपदी जी ने अपने मन के भाव को स्वीकार किया और स्वपच वाल्मीकि के चरणों में साष्टांग प्रणाम किया।

जैसे ही द्रौपदी जी ने प्रणाम किया, उसी क्षण शंख की गगनभेदी गर्जना हुई और राजसूय यज्ञ पूर्ण हुआ।

निष्कर्ष

राजसूय यज्ञ की यह कथा यह सिद्ध करती है कि भगवान की दृष्टि में सबसे महान वही है जो सबसे अधिक विनम्र है। स्वपच वाल्मीकि जैसे अकिंचन भक्त हमें सिखाते हैं कि भक्ति का मार्ग अहंकार छोड़कर समर्पण का मार्ग है।

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