वृंदावन की भूमि, जहाँ प्रेम, भक्ति और लीलाओं की पावन गाथाएँ जीवंत होती हैं, वहीं एक दिव्य संत प्रकट हुए – पूज्य श्री स्वामिनी शरण जी महाराज, जिनका सम्पूर्ण जीवन राधा नाम की साधना में लीन रहा। उनके श्रीअंगों में राधा नाम इस प्रकार प्रकाशित हो चुका था कि रोम-रोम से “राधा राधा” गूंज उठता था।
इस कथा में:
राधा नाम का प्रभाव
गुरुदेव स्वयं कहते थे कि स्वामिनी शरण जी की कुटिया में राधा नाम का ऐसा नशा था कि वहाँ रहते ही ध्यान, जप, संकीर्तन स्वतः होने लगता। स्वामी जी कई वर्षों तक न बोलते, न बाहर जाते – बस राधा नाम के चिंतन में तन्मय रहते। भूख-प्यास तक का भान नहीं रहता। वह अवस्था स्वयं में भक्ति की पराकाष्ठा थी – जब नाम ही श्वास बन जाए और श्वास ही नाम।
वाणी में राधा, दृष्टि में प्रिया
स्वामिनी शरण जी की आंखें प्रियालाल के दर्शन से भीगी हुई लगती थीं। भक्तजन कहते – “ऐसे प्रेमिल नेत्र कभी देखे नहीं। लगता था आंसू गिरने ही वाले हैं।” वो अपने जीवन में कभी अपने नाम का प्रचार नहीं करते, सब कुछ प्रिया जी को अर्पण कर दिया। एक बड़े जमींदार ने वृंदावन की सम्पूर्ण भूमि उन्हें समर्पित की, पर उन्होंने वो भी अपने गुरुवंश को दे दी।
वृंदावन में लीला और साधना का संगम
वे चतुराश्रम के मध्य प्रिया-प्रीतम की लीला में लीन रहते थे। उनका स्वर, उनकी वाणी, सब रस में डूबे हुए थे। श्री हरिवंश महाप्रभु की वाणी और चतुराश्रम की परंपरा उनके जीवन में जीवित हो उठी थी।
वे कहते थे “रसना कट जाए यदि राधा नाम के सिवा कुछ बोलूँ, कान फूट जाए यदि राधा यश के सिवा कुछ सुनूँ, नेत्र फूट जाए यदि प्रियाजी के सिवा कुछ देखूँ।”
स्वामिनी शरण जी की साधना कुटी
वृंदावन की एक छोटी-सी कुटिया, जहाँ प्रेमदास जी भी रहे, वही स्थान उनके तप और साधना का केंद्र था। यहीं राधा नाम की परमाणु वृत्ति को उन्होंने अपने जीवन का केंद्र बनाया। उन्होंने संसार के वैभव को नहीं, केवल राधा नाम को अपनाया।
अनन्य भक्ति का आदर्श
स्वामिनी शरण जी महाराज का जीवन उस आदर्श भक्ति का स्वरूप है जहाँ प्रेम, समर्पण और निष्ठा चरम पर होती है। वे श्री राधा के अनन्य थे – उनके हृदय में वही विराजमान थीं। और जब कोई उनसे पूछता कि सबसे बड़ा धनी कौन है? तो उत्तर मिलता – “जिसको दंपति संपत्ति (प्रिया-प्रीतम का संग) प्राप्त हो।”
निष्कर्ष:
स्वामिनी शरण जी महाराज का जीवन राधा नाम की जीवंत अनुभूति है। वो न केवल साधक थे, अपितु स्वयं नाम रूप में स्थित हो चुके संत थे। ऐसे महापुरुषों की कृपा से ही हमारे जीवन में राधा नाम में आसक्ति, भक्ति और स्थिरता जागृत हो सकती है।
“श्री स्वामिनी शरण जी महाराज की जय।”





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