प्रेत जिसने याद की पूरी भगवद्गीता एकांत में नामजप और रहस्यमयी मुलाकात
भाई जी, जो कि निरंतर भगवन्नाम का जप करते थे, एक दिन समुद्र के किनारे एकांत में ध्यानस्थ बैठे थे। जैसे-जैसे अंधेरा घिरता गया, वे एक बेंच पर बैठकर लहरों को निहारते हुए नामस्मरण कर रहे थे। तभी उनकी दृष्टि एक सफेद वस्त्रधारी सज्जन पर पड़ी, जो एकटक उनकी ओर देखे जा रहे थे।
जब भाई जी ने उन्हें विनम्रता से बैठने को कहा, तो उन्होंने एक चौंकाने वाला रहस्य बताया “मैं कोई इंसान नहीं, एक प्रेत हूं।” इस सत्य को सुनते ही भाई जी कुछ क्षणों के लिए विचलित हो गए। लेकिन उस प्रेत ने तुरंत स्पष्ट किया, “मैं अनिष्ट करने वाला नहीं, बस सहायता मांगने आया हूं।”
इस कथा में:
प्रेत योनि का भयावह सच
प्रेत ने बताया कि वह उन आत्माओं में से है जो शास्त्रविरुद्ध आचरण के कारण प्रेत योनि को प्राप्त होती हैं। उन्होंने कहा कि प्रेत ना तो खा सकते हैं, ना पी सकते हैं, सिवाय तब जब वे किसी अपवित्र व्यक्ति पर सवार हो जाएं। लेकिन जो व्यक्ति भगवन्नाम का जप करता है, उसकी रक्षा स्वयं नाम करता है प्रेत उसका स्पर्श भी नहीं कर सकते।
प्रेतों की अनेक श्रेणियाँ होती हैं कुछ अच्छे होते हैं, कुछ अत्यंत भयावह। वे पीड़ा में जीते हैं, चिल्लाते रहते हैं, और यदि कोई पवित्र नहीं है, तो उनके जीवन में हस्तक्षेप भी कर सकते हैं।
नामजप की अपार शक्ति
प्रेत ने भाई जी से प्रार्थना की कि वे उसका उद्धार करें। उसने बताया कि उसे पूरी भगवद्गीता कंठस्थ है – सभी 18 अध्याय! लेकिन फिर भी, वह प्रेत योनि में क्लेश झेल रहा है। उसने अनुरोध किया कि गया जी में उसका श्राद्ध करवाया जाए और भगवान का नामकीर्तन उसके लिए किया जाए।
भाई जी ने उसकी सहायता की श्राद्ध कराया, कीर्तन करवाया। कुछ समय बाद वही प्रेत फिर आया, लेकिन इस बार उसने कृतज्ञता व्यक्त की। उसका उद्धार हो चुका था। उसने बताया कि अब उसे ऊर्ध्वगति प्राप्त हो रही है।
भक्तों के लिए चेतावनी
प्रेत ने भाई जी को कई घटनाएं बताईं कि किस प्रकार साधारण से दिखने वाले पाप जैसे मंदिर में भगवान को अर्पित किए बिना सामग्री का उपयोग, संत सेवा के लिए दिए गए धन का दुरुपयोग मनुष्य को प्रेत योनि में पहुंचा सकते हैं। उसने कई ऐसे व्यक्तियों के नाम भी लिए जो इस कारण प्रेत बने।
इस कथा का सार यही है: पवित्रता, सत्कर्म, और नामजप ये ही रक्षा करते हैं। धर्म का मज़ाक उड़ाने या लापरवाही करने का दंड अत्यंत कठोर होता है।
संदेश
भाई जी ने कहा, “कोई देखे ना देखे, परंतु जो निर्णय करता है वह सब देख रहा है।” यह कथा हमें सावधान करती है कि कर्मों का लेखा-जोखा अत्यंत सूक्ष्म और निर्णायक है। पापों से मुक्ति का मार्ग केवल नामजप, भक्ति, और सच्चे प्रायश्चित से ही संभव है।





Leave a Reply