सच्ची भक्ति वही है जिसमें मांग नहीं होती
आज के समय में बहुत से लोग पूजा-पाठ, जाप और व्रत तो करते हैं,
लेकिन साथ ही भगवान के सामने मांगों की लंबी सूची भी रखते हैं।
भक्ति थोड़ी होती है
और अपेक्षाएँ बहुत ज्यादा।
हम कहते हैं यह दे दो भगवान, वह दे दो भगवान।
और यदि भगवान ने दस बार हमारी बात मान ली, लेकिन ग्यारहवीं बार नहीं मानी, तो वही श्रद्धा डगमगा जाती है।
ऐसी भक्ति कमजोर भक्ति होती है।
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भक्ति को बलवान और पुष्ट होना चाहिए
सच्ची भक्ति निष्काम होती है।
निष्काम भक्ति में कोई सौदा नहीं होता।
“हे प्रभु, हम आपसे प्रेम करते हैं।
आप हमारी तरफ देखें या न देखें।
आप हमें सुख दें या न दें।
फिर भी हमारा प्रेम आपसे बना रहेगा।”
यह भक्ति परिस्थितियों पर निर्भर नहीं करती।
यह भक्ति टूटती नहीं, झुकती नहीं।
मांगों पर टिकी भक्ति श्रद्धा को कमजोर कर देती है
जब भक्ति सिर्फ मांगों पर टिकी होती है,
तो भगवान से विश्वास नहीं,
बल्कि अपेक्षा जुड़ी होती है।
और जब अपेक्षा पूरी नहीं होती,
तो श्रद्धा पर चोट लगती है।
असल में भगवान हमारी हर बात सुनते हैं,
लेकिन हर मांग पूरी करना सच्चा प्रेम नहीं होता।
माँ और बच्चे का उदाहरण
जैसे छोटा बच्चा माँ से कहता है—
“मुझे चाकू से खेलने दो।”
माँ जानती है कि चाकू से खेलना उसके लिए खतरनाक है,
इसलिए बच्चा चाहे कितना भी रोए,
माँ उसे चाकू नहीं देती।
क्या इसका अर्थ यह है कि माँ को बच्चे से प्रेम नहीं?
नहीं।
वह प्रेम ही तो है जो रोकता है।
भगवान वही देते हैं जो मंगलकारी हो
हम कई बार भगवान से ऐसी चीजें मांगते हैं
जो हमारे जीवन के लिए उचित नहीं होतीं—
माया, अहंकार, गलत इच्छाएँ।
भगवान देखते हैं कि यदि यह दिया गया
तो इसका मंगल नहीं होगा।
इसलिए वे नहीं देते।
भगवान मंगल भवन हैं। वे अपने भक्त का कभी अमंगल नहीं करते।
चाहे भक्त रोए, शिकायत करे या नाराज़ हो भगवान वही करते हैं जो अंततः हितकारी होता है।
निष्काम भक्ति ही सच्चा प्रेम है
निष्काम भक्ति का भाव होता है
“हे प्रभु, आप जो करें वही श्रेष्ठ है।
मुझे समझ आए या न आए।
मुझे मिले या न मिले।
मेरा विश्वास आप पर अडिग रहेगा।”
यही भक्ति भगवान को प्रिय होती है
और भक्त को भीतर से अचल बना देती है।
निष्कर्ष
जहाँ मांग है,
वहाँ भक्ति कमजोर है।
और जहाँ समर्पण है,
वहाँ भगवान स्वयं उतर आते हैं।
निष्काम भक्ति ही सच्ची भक्ति है।





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