कई बार जीवन में ऐसा होता है कि डर, संकट या मजबूरी मनुष्य को उस रास्ते पर ले आती है जहाँ से आत्म-परिवर्तन शुरू होता है।
यह कथा भी ऐसे ही एक साधारण मछुआरे की है, जिसने जान बचाने के लिए संत का वेश धारण किया, लेकिन उसी वेश ने उसे सच्ची भक्ति का मार्ग दिखा दिया।
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राजा का सरोवर और कठोर नियम
एक राजा का विशाल सरोवर था।
उस सरोवर में सुंदर मछलियाँ पाली गई थीं।
राजा स्वयं मछलियों की सेवा करने आता था
और उनकी रक्षा के लिए
एक कठोर नियम बना रखा था—
जो भी मछली मारेगा, उसे प्राणदंड दिया जाएगा।
राजाज्ञा पूरे राज्य में प्रसिद्ध थी।
गरीब मछुआरे की दुविधा
एक दिन एक गरीब मछुआरा उस सरोवर के पास पहुँचा।
उसने देखा तालाब मछलियों से भरा हुआ है। भूख, गरीबी और लालच ने मन को डगमगाया।
उसने सोचा
“दो मिनट में सैकड़ों मछलियाँ पकड़ी जा सकती हैं,
कौन देखता है?”
लेकिन उसे प्राणदंड का डर भी था।
घोड़ों की टाप और मृत्यु का भय
जैसे ही उसने जाल डाला,
अचानक घोड़ों की टापों की आवाज़ आई।
धूल का गुबार उठा।
उसे लगा
राजा की सवारी आ रही है।
उसके मन में एक ही विचार आया
“अब तो निश्चित ही मारे गए।”
नकली संत का वेश
जान बचाने के लिए उसने तुरंत
- जाल मिट्टी में दबा दिया
- कपड़े उतार दिए
- शरीर पर मिट्टी लगा ली
- संत का वेश धारण कर
- आँख बंद कर ध्यान में बैठ गया
उसने सोचा
“प्राण बचाने का यही एक उपाय है।”
राजा वहाँ से गुजरे।
उन्होंने देखासरोवर के किनारे
एक महान संत ध्यान में बैठे हैं,
जिनके शरीर पर कोई वस्त्र नहीं,
केवल वैराग्य झलक रहा है।राजा ने
- अशर्फियाँ निकालीं
- चुपचाप संत के चरणों में रख दीं
- साष्टांग दंडवत किया
- बिना विघ्न डाले वहाँ से चले गए
आत्मबोध का क्षण
राजा के जाने के बाद
मछुआरे ने आँखें खोलीं।
उसने देखा
जहाँ उसे प्राणदंड मिलना चाहिए था,
वहाँ उसे नमस्कार और अशर्फियाँ मिली थीं।
तभी उसके भीतर एक गहरी बात उठी
“जब नकली वेश धारण करने पर
एक राजा प्रणाम कर गया,
तो यदि मैं सच में भगवान का बन जाऊँ
तो क्या होगा?”उसी क्षण उसने निश्चय किया
“आज से मैं सब कुछ छोड़ता हूँ।
मैं सच में भगवान का भजन करूँगा।”डर से लिया गया वेश
ज्ञान में बदल गया।
नाटक ने साधना का रूप ले लिया।
निष्कर्ष
कभी-कभी
हम जो बनने का अभिनय करते हैं,
वही एक दिन
हमारी वास्तविक पहचान बन जाता है।
यदि नकली संत भी
जीवन बदल सकता है,
तो सच्ची भक्ति
मनुष्य को कहाँ से कहाँ पहुँचा सकती है
यह सोचने योग्य है।





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