किस बात की घबराहट ? क्या चला जाएगा तुम्हारा?
जिसे तुम अपना मान रहे हो, वह कभी तुम्हारा था ही नहीं। संसार माया का खेल है यह बदलता रहता है। कहीं राजमहल बनते हैं, कहीं खंडहर हो जाते हैं। कहीं जन्म का उत्सव है, तो कहीं मृत्यु का शोक। यह सब एक ही मंच पर चल रहा है। पर इस पूरे खेल में एक चीज़ कभी नहीं बदलती आत्मा।
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माया का संसार: बदलता हुआ दृश्य
यह संसार निरंतर परिवर्तन में है।
आज जो है, कल नहीं रहेगा।
- कहीं नगर बसते हैं, कहीं उजड़ जाते हैं
- कहीं नदी बह रही है, कहीं सूखा पड़ गया
- कहीं विवाह का उल्लास है, कहीं मृत्यु का विलाप
यह सब माया की लीला है। दृश्य बदलते रहते हैं, पर दर्शक वही रहता है।
आत्मा का सत्य: जिसे कोई अस्त्र काट नहीं सकता
आज तक कोई ऐसा अस्त्र नहीं बना,
जो आत्मा का छेदन-भेदन कर सके।
आत्मा न कभी मरती है,
न किसी को मारती है।
भगवद् गीता में भी यही सत्य कहा गया है आत्मा न जन्म लेती है, न मरती है।
तो फिर भय किस बात का?
जीवन एक रंगमंच है
यह संसार एक रंगमंच है
और हम सब अपनी-अपनी भूमिका निभा रहे हैं।
जैसे फिल्मों में अभिनेता अलग-अलग किरदार निभाता है,
वैसे ही यहाँ भी नाम, रूप और परिस्थिति बदलती रहती है।
आज कोई राजा है,
कल वही भिक्षुक हो सकता है।
भूमिका बदलती है,
पर अभिनेता वही रहता है।
श्रीकृष्ण और माया का पर्दा
आप जान लें यह पूरा खेल श्रीकृष्ण की माया का है।
एक ही चेतना अलग-अलग नाम और रूप में
भूमिकाएँ निभा रही है।
जो इस माया के पर्दे को पहचान लेता है, वह जीवन मुक्त हो जाता है।
और जो नहीं पहचान पाता,
वही इसी खेल में फँसा रह जाता है।
ज्ञान क्या है?
ज्ञान केवल बातें करने का नाम नहीं है।
ज्ञान वह है
- जो जीवन में उतरे
- जो दृष्टि बदल दे
- जो भय को समाप्त कर दे
अक्सर लोग ज्ञान की बातें तो बहुत करते हैं,
लेकिन उसे अपने भीतर नहीं उतार पाते।
इसीलिए
ज्ञान होते हुए भी
मन परेशान रहता है।
समाधान: पहचान लो यह खेल है
बस एक बात समझ लो , यह सब एक खेल है।
माया का खेल।
जिस दिन तुमने पहचान लिया
कि तुम शरीर नहीं, भूमिका नहीं, बल्कि साक्षी आत्मा हो, उसी दिन घबराहट समाप्त हो जाएगी।
यही ज्ञान है।
यही मुक्ति का मार्ग है।
डर उसी को लगता है
जो अस्थायी को स्थायी मान लेता है।
जिस दिन यह समझ आ गई
कि आत्मा अमर है
और संसार परिवर्तनशील,
उस दिन
शांति अपने आप आ जाती है।





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