कौन क्या कहता है छोड़ो: जीवन जीने की कला

कौन क्या कहता है छोड़ो: जीवन जीने की कला

कौन क्या कहता है छोड़ो: जीवन जीने की कला

लोग क्या कहते हैं, इस चिंतन में उलझकर मनुष्य नकारात्मक विचारों और डिप्रेशन में चला जाता है। इस ब्लॉग में जानिए कैसे “कौन क्या कहता है” छोड़कर अपनी मस्ती में रहना, सुख-दुख को समान भाव से सहना और भगवान का नाम जपकर जीवन को शांत, सकारात्मक और पवित्र बनाया जा सकता है। यह भगवान के सच्चे भक्त की पहचान और जीवन जीने की कला सिखाता है।

कौन क्या कहता है छोड़ो: भगवान के भक्त की पहचान

मनुष्य का सबसे बड़ा दुख यही है कि वह हर समय यह सोचता रहता है कि मेरे विषय में कौन क्या कह रहा है। यही चिंतन धीरे-धीरे नकारात्मक विचारों को जन्म देता है और व्यक्ति डिप्रेशन की ओर बढ़ने लगता है।

लोगों की बातों में उलझना क्यों नुकसानदायक है

इस संसार में कोई भी व्यक्ति हमेशा एक-सा व्यवहार नहीं करता।
कभी अनुकूल व्यवहार मिलता है, तो कभी प्रतिकूल।
जो व्यक्ति दूसरों के व्यवहार से अपना सुख-दुख तय करता है, वह हमेशा फंसा रहता है।

अपनी मौज में रहना ही सच्ची स्वतंत्रता

“उसकी मौज में अपनी मौज मत मिलाओ, अपनी मौज में रहना सीखो।”

जो व्यक्ति अपनी मस्ती में जीना सीख लेता है, वही वास्तव में मुक्त होता है।
दूसरों के शब्द, व्यवहार और सोच को अपने मन पर हावी न होने दें।

सहनशीलता: मनुष्य जीवन का उद्देश्य

मनुष्य जन्म सहने के लिए मिला है

  • मान सहो
  • अपमान सहो
  • सुख सहो → अभिमान न आने देना
  • दुख सहो → निराश और उदास न होना

मुस्कुराकर बड़े से बड़े दुख को पार करना ही भगवान के भक्त का स्वरूप होता है।

यदि जीवन में शांति और स्थिरता चाहिए तो

  • भगवान का नाम जप करो
  • भगवान की महिमा सुनो
  • नकारात्मक चिंतन छोड़ो

इनसे हृदय पवित्र होता है और जीवन सरल बनता है।

निष्कर्ष

कौन क्या कहता है, यह छोड़ देना ही सच्ची साधना है।
जो व्यक्ति सुख-दुख, मान-अपमान को समान भाव से सह लेता है, वही सच्चा भक्त है।
भगवान के नाम में रमकर जीवन को आनंदमय बनाइए।

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