जब ठाकुर जी स्वयं गवाही देने पंचायत में पहुँचे

जब ठाकुर जी स्वयं गवाही देने पंचायत में पहुँचे

जब ठाकुर जी स्वयं गवाही देने पंचायत में पहुँचे

जब ठाकुर जी ने पंचायत में दी अपने भक्त के लिए गवाही

भारत की भक्ति परंपरा में अनगिनत प्रसंग मिलते हैं, जहाँ भगवान ने अपने भक्तों के लिए असंभव को संभव कर दिखाया। एक ऐसी ही कथा है जब भगवान श्रीकृष्ण ठाकुर जी स्वयं साक्षी देने पंचायत में चलकर आए।

एक वृद्ध ब्राह्मण तीर्थ यात्रा की इच्छा रखते थे, पर उनके पुत्र उनकी सेवा में अनिच्छुक थे। ऐसे में उन्होंने एक निर्धन किंतु सेवाभावी युवक से अनुरोध किया कि वह उन्हें तीर्थ यात्रा पर ले चले। युवक ने श्रद्धा से सेवा स्वीकार की। तीर्थों का दर्शन करते हुए जब दोनों वृंदावन पहुँचे, तो वृद्ध ब्राह्मण बीमार पड़ गए। उस युवक ने जिस तरह दिन-रात सेवा की, वह माँ की ममता को भी पीछे छोड़ दे।

ठीक होने पर, वृद्ध ब्राह्मण भाव-विभोर हो गए। उन्होंने ठाकुर जी के समक्ष वचन दिया कि वे अपनी पुत्री का विवाह उस युवक से करेंगे और उसे सम्पत्ति भी देंगे। युवक तो इस प्रस्ताव से चकित रह गया, लेकिन वृद्ध ने कहा:
“यह वचन गुपाल जी के सामने है, अब तो यह तय है।”

लेकिन जब यात्रा पूरी कर वे अपने गांव लौटे, वृद्ध ब्राह्मण अपने वचन से पलट गए। उनके पुत्रों ने युवक को अपमानित कर घर से निकाल दिया। दुःखी युवक ने ग्राम पंचायत बुलाई और सबके सामने भगवान को साक्षी बताते हुए विवाह की मांग की। पर पंचायत में गवाही के लिए तीसरे साक्षी की आवश्यकता थी।

युवक ने कहा “वचन के समय केवल तीन उपस्थित थे: वृद्ध, मैं और गुपाल जी।”
पंचों ने चुनौती दी:
“अगर भगवान स्वयं आकर गवाही दें, तो विवाह मान्य होगा।”

युवक ने भाव-विभोर होकर वृंदावन की ओर रुख किया। ठाकुर जी के मंदिर जाकर दरवाज़ा खटखटाया, प्रार्थना की, विनती की:
“हे गुपाल! यह केवल विवाह का मामला नहीं है, यह मेरे विश्वास की परीक्षा है। अगर तुमने साक्षी दी थी, तो पंचायत में चलो।”

उसके अटूट विश्वास ने भगवान को विवश कर दिया। ठाकुर जी ने स्वयं कहा
“जब तुम भोग लगाओगे, हम उसके बाद चलेंगे। पर ध्यान रखना पीछे मुड़कर मत देखना, वरना जहाँ देखोगे, वहीं हम रुक जाएंगे।”

युवक आगे-आगे चलता गया, ठाकुर जी ठुमक-ठुमक कर पीछे-पीछे आते। रस्ते में भोग लगता रहा, और नूपुर की ध्वनि चलने का प्रमाण बनती रही। लेकिन जैसे ही गाँव के पास पहुँचा, युवक के मन में संशय जागा — क्या ठाकुर जी सच में अभी भी चल रहे हैं?

उसने पीछे मुड़कर देखा — और वहीं ठाकुर जी रुक गए।

लेकिन अब सब गांववाले दौड़ पड़े। ठाकुर जी को साक्षात देख पंच भी नतमस्तक हो गए। अब कोई विवाद नहीं रहा। भगवान ने सबके सामने कहा
“हाँ, मैंने स्वयं यह वचन सुना था।”

विवाह संपन्न हुआ। विश्वास की विजय हुई। मूर्ति में भी प्राण होते हैं यह साक्षात प्रमाण बन गया।

भावनात्मक निष्कर्ष:

यह कथा केवल एक चमत्कार नहीं, बल्कि श्रद्धा, सेवा, और सच्चे संकल्प की शक्ति का जीवंत उदाहरण है। जब भाव शुद्ध हो और विश्वास अडिग, तो भगवान स्वयं भी पंच बनकर न्याय करने आते हैं।

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