जब डाकू गोवर्धन भगवान को लूटने चला – और खुद लुट गया!

जब डाकू गोवर्धन भगवान को लूटने चला – और खुद लुट गया!

जब डाकू गोवर्धन भगवान को लूटने चला – और खुद लुट गया!

जब एक डाकू भगवान को लूटने निकला!

एक समय की बात है। एक कुख्यात डाकू था गोवर्धन डाकू, जिसका नाम सुनते ही अच्छे-अच्छों के पसीने छूट जाते थे। एक दिन उसे राजकर्मचारी पकड़ने दौड़े। जान बचाकर वह घोड़ा छोड़ भागा और एक सत्संग सभा में जा घुसा, जहां पंडित परशुराम जी महाराज कथा सुना रहे थे।

कथा का विषय था वृंदावन लीला, जिसमें भगवान श्रीकृष्ण को यशोदा मैया ने सोने की करधनी, लकुटी और मोर मुकुट पहनाकर गाय चराने भेजा। गोवर्धन डाकू यह सुनकर चौंक गया “इतना धनी बालक अकेला?”

डाकू का मन भगवान में उलझा

कथा समाप्त हुई तो वह पंडित जी के पास पहुंचा, चाकू निकालकर बोला
“उस बालक का पता बताओ, जिसे यशोदा मैया ने श्रृंगार करके भेजा था। मैं वही लूटने जा रहा हूँ। जब तक लूट न लूं, पानी भी नहीं पीऊंगा!”

परशुराम जी मुस्कराए। बोले, “उसे लूट पाना आसान नहीं है। वह भगवान है श्याम सुंदर। लेकिन लो, ये माखन-मिश्री ले जाओ। अगर लूटने से पहले बहल जाए तो मारने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी।”

डाकू ने कसम खाई और चल पड़ा… श्याम सुंदर को लूटने।

वृंदावन में खोज शुरू

वृंदावन पहुंचते ही वह हर गोशाला में पूछने लगा, “श्याम सुंदर कहां है?” लोग मुस्कराते, “यह ब्रज है हर बच्चा श्याम सुंदर है।” लेकिन डाकू को तो वही चाहिए था जिसे कथा में सुना था।

एक दिन, किसी ने पुकारा “श्याम सुंदर, तेरी गाय उधर जा रही है!
डाकू दौड़ पड़ा। सामने देखा तो वही श्रृंगार, वही लकुटी, वही करधनी कथा में सुना वैसा ही दृश्य।

डाकू चाकू निकालकर आगे बढ़ा। लेकिन वह बालक हंसते हुए बोला:
“तेरा नाम क्या है?”
गोवर्धन डाकू,” उसने गर्जना की।

बालक ने कहा “गोवर्धन! तो तू मेरा नामधारी है मैं गोवर्धनधारी हूं।
यह सुनते ही डाकू के भीतर कुछ टूट गया। उसका अज्ञान जलने लगा।

भगवान का अनुग्रह और डाकू की मुक्ति

भगवान ने मुस्कराते हुए कहा, “चलो, माखन मिश्री खिलाओ।”
डाकू ने भगवान को मिश्री दी, और भगवान ने उसे भी खिलाई।

क्षण में ही उसका अंतःकरण बदल गया।
डाकू रो पड़ा। प्रभु के चरणों में गिर पड़ा
“प्रभु, मुझे नहीं लूटना। आप ही मुझे लूट लीजिए।”

परशुराम जी की भविष्यवाणी सत्य हुई
जो भगवान को पाने की सच्ची चाह रखता है, उसे भगवान मिल ही जाते हैं।

सीख क्या है इस कथा से?

  • भगवान को पाने के लिए सच्ची लगन, त्याग, और प्यास होनी चाहिए।
  • कथा-सत्संग केवल मनोरंजन नहीं, आत्मिक जागरण का माध्यम है।
  • जीवन तभी दिव्य बनता है जब नाम-स्मरण और भजन किया जाए।

संदेश:

आपका मन भगवान की ओर आकर्षित हो इसके लिए हर दिन थोड़ा समय भक्ति में लगाइए। नाम-जप, कथा श्रवण और भजन की आदत जीवन को रूपांतरित कर सकती है। जो गोवर्धन डाकू को भगवान तक पहुँचा सकती है वह आप और हम सबके लिए भी संभव है।

अगर आपको यह कथा अच्छी लगी हो तो सखुबाई जी की कथा जरूर पढ़ें।

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