इंसान को नहीं, भगवान को प्रसन्न करो: सच्चे सुख और शांति का रहस्य

इंसान को नहीं, भगवान को प्रसन्न करो: सच्चे सुख और शांति का रहस्य

इंसान को नहीं, भगवान को प्रसन्न करो: सच्चे सुख और शांति का रहस्य

हम किसी व्यक्ति को सदैव प्रसन्न नहीं रख सकते, लेकिन भगवान को प्रसन्न कर लेने से जीवन में स्थायी शांति मिलती है। जानिए मानव अपेक्षाओं और ईश्वर भरोसे का गूढ़ सत्य।

इंसान को सदैव प्रसन्न रखना असंभव है

हम चाहे जितना प्रयास कर लें, किसी व्यक्ति को सदैव प्रसन्न रखना संभव नहीं है। यह जीवन का एक कठोर लेकिन सत्य नियम है। इंसान का व्यवहार उसके स्वभाव, परिस्थितियों और मनःस्थिति पर निर्भर करता है।
आज जो व्यक्ति आपसे प्रेम कर रहा है, कल वही परिस्थितियाँ बदलने पर आपसे विमुख हो सकता है।

सदैव प्रसन्न रहना मनुष्य के वश में नहीं है, क्योंकि मनुष्य स्वयं स्थिर नहीं है।

मानव अपेक्षाएँ अक्सर दुःख का कारण बनती हैं

जब हम किसी व्यक्ति से यह अपेक्षा करने लगते हैं कि वह हमेशा हमारा साथ देगा, हमेशा समझेगा और कभी धोखा नहीं देगा तभी दुख की शुरुआत होती है।

यह संसार स्वार्थ और अपेक्षाओं पर आधारित है।
यहाँ प्रेम भी प्रायः किसी लाभ, सुविधा या आवश्यकता से जुड़ा होता है।

संसार का प्रेम और ईश्वर का प्रेम

संसार का प्रेम देखकर किया जाता है
रूप, धन, पद या सुविधा देखकर।

लेकिन ईश्वर का प्रेम निःस्वार्थ होता है
वह बिना किसी कारण के, बिना किसी शर्त के होता है।

इसीलिए कहा गया है:
संसार से आशा रखोगे तो टूटोगे,
भगवान से आशा रखोगे तो जुड़ जाओगे।

भगवान को प्रसन्न करने से सब प्रसन्न हो जाता है

भगवान सर्वज्ञ हैं।
उन्हें किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं।

जब हम ईश्वर को प्रसन्न करते हैं

  • हमारी बुद्धि शांत होती है
  • मन स्थिर होता है
  • और जीवन में संतुलन आता है

भगवान को प्रसन्न कर लेने पर जीवन की अनेक उलझनें स्वयं सुलझने लगती हैं।

सच्चा सहारा केवल भगवान हैं

मनुष्य का सहारा अस्थायी है,
ईश्वर का सहारा स्थायी है।

इसलिए संतों ने कहा है:

आशा एक राम जी से रखो,
दूजी आशा छोड़ दो।
नाता एक राम जी से जोड़ो,
दूजा नाता तोड़ दो।

निष्कर्ष

  • इंसान को प्रसन्न रखने की चिंता छोड़ो
  • ईश्वर को प्रसन्न करने का प्रयास करो
  • अपेक्षा कम करो, भक्ति बढ़ाओ
  • भरोसा संसार पर नहीं, भगवान पर रखो

यही जीवन की सच्ची शांति और आनंद का मार्ग है।

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