हरिपाल नाम के एक महान भागवत ने अपने गुरु से पूछा – “गृहस्थ जीवन में भगवान की प्राप्ति कैसे हो?”
गुरुदेव ने उत्तर दिया:
“गृहस्थ जीवन में संत सेवा ही सरल और निश्चित मार्ग है भगवान तक पहुँचने का।”
वास्तव में, यम, नियम, ध्यान, समाधि जैसे गूढ़ साधन गृहस्थों के लिए कठिन हैं। लेकिन संत सेवा, सच्चे मन से की जाए तो भगवान को पाना सहज हो जाता है।
हरिपाल जी की निष्कलंक संत सेवा
हरिपाल जी ने गुरु के वचनों को जीवन का सत्य मान लिया। उन्होंने संत सेवा को ही अपना धर्म बना लिया।
हर दिन संत मंडली के लिए विशेष भोजन, सत्कार, स्नान, आरती और पूजा का आयोजन करते।
धीरे-धीरे उनका सारा धन, घर की संपत्ति, ज़मीन और गहने संत सेवा में लग गए। यहां तक कि बाजार से कर्ज़ तक लेने लगे। एक दिन स्थिति यह आ गई कि न कोई संपत्ति बची, न कोई उधार देने को तैयार।
संत भूखे ना जाएं : डाकू बने भक्त!
भोजन का कोई उपाय न देख, हरिपाल जी ने एक मार्ग पर भाला लेकर बैठना शुरू कर दिया
यदि संतों को भोजन कराने के लिए मुझे चोरी भी करनी पड़ी, तो भी करूंगा।
लेकिन उन्होंने कभी किसी को मारा नहीं। एक नियम बना लिया – जो राम का नाम लेता, भागवत चिन्ह धारण करता, उसे नहीं लूटते।
इससे एक और चमत्कार हुआ – पूरा रास्ता राम नाम से गूंजने लगा। हर व्यक्ति नामजप करने लगा, सिर्फ डाकू से बचने नहीं, बल्कि नाम स्मरण से डर के कारण भी।
जब भगवान स्वयं आये लुटने!
एक दिन भगवान श्रीकृष्ण और रुक्मिणी जी पूर्ण श्रृंगार में हरिपाल जी के पास आये।
उन्होंने न कोई भागवत चिन्ह धारण किया, न कोई नामजप किया – वे साधारण धनवान व्यापारी के रूप में आए।
उद्देश्य: हरिपाल जी की संत सेवा के लिए स्वयं को “लुटवाना”।
हरिपाल जी ने उन्हें देखकर सोचा – “आज तो महीनों की संत सेवा का आयोजन हो जाएगा!”
भाला ताने बोले
सब आभूषण उतारो, इससे संतों को भोजन करायेंगे।
भगवान ने रुक्मिणी जी से कहा – “उतारो, यह वही भक्त है जिसके दर्शन करने आये हैं।”
क्मिणी जी की विस्मय और भगवान का रहस्योद्घाटन
रुक्मिणी जी पहले हैरान थीं, पर जब भगवान ने बताया कि हरिपाल जी वही महान संत हैं जिन्होंने सर्वस्व त्याग दिया, तो वह भी भाव-विभोर हो गईं।
जब हरिपाल जी ने उनकी अंगूठी भी उतारी, तो बोले
इतनी कीमती अंगूठी में तो कई संतों का पेट भर जाएगा।
हरिपाल जी को भगवान का आलिंगन और वरदान
भगवान ने उन्हें हृदय से लगाकर कहा: तुम मेरे सबसे प्रिय भक्त हो। तुम्हारी संत सेवा ने मुझे लूटने को विवश कर दिया।
भगवान ने अपने सभी आभूषण हरिपाल जी को दिए और कहा
इनसे कर्ज़ चुकाओ और आजीवन लाखों संतो को भोजन कराओ। यह एश्वर्य कभी घटेगा नहीं।
संत सेवा से भगवत साक्षात्कार
जब भगवान और रुक्मिणी जी ने स्वयं प्रकट होकर संतों के दर्शन कराए और भोजन पाया, तब संतों ने हरिपाल जी के माध्यम से भगवान का साक्षात्कार किया।
सभी ने कहा हरिपाल जी के जैसा भक्त और उनकी संत सेवा कभी न देखी, न सुनी!
साधु सेवा से मिलती है भगवत प्राप्ति
यह कथा हमें सिखाती है कि सच्चे हृदय से की गई संत सेवा निश्चित ही भगवान की प्राप्ति कराती है।
हरिपाल जी की तरह यदि हम अपना तन-मन-धन भक्ति में समर्पित करें, तो स्वयं भगवान को भी आना पड़ता है।
प्रेरणा:
जब भी जीवन में संत सेवा का अवसर मिले, तो उसे जीवन का परम लाभ समझें।
यह सेवा केवल धर्म नहीं, बल्कि भगवत प्राप्ति का सीधा मार्ग है।





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