भारत में भक्ति केवल मंदिरों तक सीमित नहीं है, बल्कि वह जीवन के हर क्षेत्र में दिखाई देती है। ऐसी ही एक अद्भुत और आस्था से भरपूर घटना मध्य प्रदेश की है, जो लगभग 30–40 वर्ष पुरानी मानी जाती है। यह घटना बताती है कि जब भक्ति पूर्ण होती है, तो भगवान स्वयं अपने भक्त का भार उठा लेते हैं।
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हनुमान जी का परम भक्त सिपाही
मध्य प्रदेश के एक शहर में हनुमान जी का एक प्राचीन मंदिर है। उसी मंदिर के ठीक बगल में एक पुलिस थाना स्थित है। उस थाने में एक साधारण सिपाही (कॉन्स्टेबल) कार्यरत था। पद में छोटा, लेकिन भक्ति में अत्यंत ऊँचा।
उस सिपाही की दिनचर्या बहुत सरल थी
हर सुबह वह सबसे पहले हनुमान जी के दर्शन करता, उन्हें प्रणाम करता और फिर थाने जाता।
उसकी भक्ति इतनी गहरी थी कि कई बार वह मंदिर में तीन-चार घंटे तक ध्यान में बैठा रहता। कभी आँखें बंद, कभी हनुमान जी की मूर्ति को निहारते हुए। ध्यान से उठते ही वह अचानक दौड़कर थाने पहुँचता।
अफसर की नाराज़गी और अंतिम चेतावनी
थाने के इंस्पेक्टर को यह बात बिल्कुल पसंद नहीं थी। आए दिन वह सिपाही को डाँटता
“तुम समय पर क्यों नहीं आते?
ड्यूटी करनी है या मंदिर में बैठना है?”
एक दिन तो बात यहाँ तक पहुँच गई कि इंस्पेक्टर ने साफ कह दिया
“अगर फिर देर हुई, तो तुम्हें नौकरी से निकाल दूँगा।”
सिपाही बहुत दुखी हुआ। अब वह मंदिर के अंदर जाने से डरने लगा। बाहर से ही हनुमान जी को प्रणाम कर लेता और चला जाता।
लेकिन उसका मन बेचैन रहने लगा
“क्या मेरी नौकरी इतनी बड़ी है कि मैं हनुमान जी को दूर से देखूँ?
नौकरी जाएगी तो क्या, हनुमान जी तो जीवन भर साथ रहेंगे।”भक्ति की परीक्षा
एक दिन उसने निश्चय कर लिया
“आज जो होगा देखा जाएगा।
आज मैं अंदर जाकर ही दर्शन करूँगा।”वह मंदिर के अंदर गया, हनुमान जी को प्रणाम किया और ध्यान में बैठ गया।
आमतौर पर वह 3–4 घंटे बैठता था, लेकिन उस दिन 8 घंटे तक समाधि में बैठा रहा।शाम को ध्यान टूटा तो उसने कहा
“जय हो हनुमान जी महाराज।
शायद आप चाहते हैं कि मेरी नौकरी छूट जाए।
ठीक है, अब मैं स्वयं जाकर इस्तीफ़ा दे देता हूँ।”चौंकाने वाला मोड़
वह सीधे थाने पहुँचा और इंस्पेक्टर से बोला
“साहब, मुझे नौकरी से निकाल दीजिए।
मैं इस नौकरी के योग्य नहीं हूँ।”इंस्पेक्टर हैरान हो गया
“तुम क्या कह रहे हो?
आज तो तुमने कमाल कर दिया!”सिपाही बोला
“मैं तो आज आया ही नहीं था, साहब।
मैं सुबह से मंदिर में था।”इंस्पेक्टर और बाकी पुलिसवाले बोले
“तुम मज़ाक कर रहे हो?
आज सुबह हम सब एक चोर को पकड़ने गए थे।
तुमने ही उसे पकड़ा, खूब मारा-पीटा।
चोर खून से लथपथ हो गया था।
हम तो तुम्हें रोक रहे थे।”
भक्त काँप उठा
यह सुनते ही सिपाही के हाथ-पाँव काँपने लगे।
उसने कहा
“मैं कसम खाता हूँ,
मैंने आज सुबह थाने की शक्ल भी नहीं देखी।
मैं तो मंदिर में था।”
तभी उसके मुख से अनायास निकल पड़ा
“हे नाथ!
आज आप ही मेरी जगह ड्यूटी पर गए थे।
इसी कारण वह चोर इतना क्रोधित था।”निष्कर्ष
यह घटना कोई कथा नहीं, बल्कि आस्था का जीवंत प्रमाण है।
जब भक्त पूर्ण समर्पण कर देता है, तो भगवान स्वयं उसकी ज़िम्मेदारी संभाल लेते हैं।यह कहानी हमें सिखाती है
- भक्ति दिखावे की नहीं, समर्पण की होनी चाहिए
- भगवान देर नहीं करते, बस विश्वास की परीक्षा लेते हैं
- जहाँ सच्ची श्रद्धा होती है, वहाँ असंभव भी संभव हो जाता है
जय बजरंग बली।





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