दुःख का वास्तविक कारण क्या है? विवेक और मूर्खता पर आधारित यह प्रेरणादायक कथा सिखाती है कि सुख परिस्थिति नहीं, सोच पर निर्भर है।
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दुःख का कारण क्या है?
दुःख का कारण स्थिति नहीं, बल्कि सोच है।
दुःख का कारण गरीबी नहीं, बल्कि अविवेक है।
दुःख का कारण जो मिला नहीं, उस पर ध्यान देना है।
और सुख का कारण जो मिला, उसका स्वीकार करना है।
विवेक और मूर्खता की कथा
दो पंडित कहीं बैठे थे। वे दोनों भूखे थे और आज भोजन का कोई ठिकाना नहीं था। तभी एक भगत वहाँ आया और बोला
“आइए, मेरे यहाँ निमंत्रण है। प्रसाद ग्रहण कीजिए।”
दोनों पंडित प्रसन्न होकर उसके साथ चले गए। वहाँ उन्होंने भरपेट भोजन किया। भोजन के उपरांत भगत ने दोनों को ₹11–₹11 दक्षिणा दी। इसके बाद दोनों पंडित वहाँ से निकल पड़े।
भगत ने ध्यान दिया कि बाहर निकलते समय दोनों के चेहरे अलग-अलग भावों से भरे हुए थे
एक पंडित अत्यंत प्रसन्न था, जबकि दूसरा स्पष्ट रूप से दुखी।
भगत ने पहले प्रसन्न पंडित से पूछा
“आप इतने खुश क्यों हैं?”
उसने उत्तर दिया
“आज तो भोजन का भी ठिकाना नहीं था। प्रभु की कृपा से भोजन मिला और ऊपर से ₹11 भी मिले। इससे अधिक और क्या चाहिए?”
फिर भगत ने दूसरे पंडित से पूछा
“आप दुखी क्यों हैं?”
उसने कहा
“हमने सोचा था कि आज कोई बड़ा यजमान मिलेगा जो ₹51 देगा। आपने केवल ₹11 दिए। यानी हमें ₹40 का घाटा हो गया, इसलिए मैं दुखी हूँ।”
अब प्रश्न उठता है
दुःख का वास्तविक कारण क्या है?
पहले पंडित ने वर्तमान को देखा
भूख थी, भोजन मिला।
खाली हाथ थे, कुछ प्राप्त हुआ।
इसलिए वह सुखी था।
दूसरे पंडित ने कल्पना को देखा
जो मिला नहीं, उसी का हिसाब लगाया।
जो था, उसका मूल्य ही नहीं समझा।
इसलिए वह दुखी हो गया।
विवेकवान व्यक्ति का सुख
जो व्यक्ति विवेकवान होता है, वह कम में भी संतुष्ट रहता है।
और जो मूर्ख होता है, वह बहुत पाकर भी दुखी रहता है।
इसलिए शास्त्रों ने कहा है
सुख बाहरी परिस्थितियों से नहीं,
बल्कि अंतर की समझ से आता है।
यदि मनुष्य में विवेक है,
तो वह गरीबी में भी सुख से जी सकता है।
और यदि विवेक नहीं है,
तो समृद्धि भी उसे शांति नहीं दे सकती।
निष्कर्ष
- दुःख का कारण अभाव नहीं, अपेक्षा है
- सुख का कारण धन नहीं, संतोष है
- विवेक जीवन को सरल बनाता है
- मूर्खता जीवन को भारी बना देती है
जो मिला है, उसका सम्मान करना सीखिए
यही सच्चा सुख है।





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