ढाई किलो भक्ति: भक्त अढ़ैया जी की सरलता से प्रसन्न हुए भगवान श्रीराम

ढाई किलो भक्ति: भक्त अढ़ैया जी की सरलता से प्रसन्न हुए भगवान श्रीराम

ढाई किलो भक्ति: भक्त अढ़ैया जी की सरलता से प्रसन्न हुए भगवान श्रीराम

ढाई किलो भक्ति भक्त अढ़ैया जी की विनोदी भक्ति और भगवान श्रीराम की करुणा

कभी-कभी भगवान को प्रसन्न करने के लिए न तो विशेष वेद मंत्रों की ज़रूरत होती है, न ही कठिन तपस्या की। बस एक सरल और निष्कलंक हृदय ही पर्याप्त होता है। यह साक्षात प्रमाणित करता है भक्त अढ़ैया जी की कथा एक अत्यंत सरल, भोला, लेकिन भावनाओं से भरा हुआ युवक जिसकी भक्ति ने स्वयं भगवान श्रीराम को अपने पूरे परिवार समेत उसकी थाली में पधारने पर विवश कर दिया।

भक्त अढ़ैया ढाई किलो का प्रेम

गाँव में “अढ़ैया” नाम का युवक था, जिसका नाम ही उसके भोजन की मात्रा से पड़ा ढाई किलो आटा उसका प्रतिदिन का भोजन। ज्ञान-ध्यान से दूर, अत्यंत सहज, भोला और विनोदी। जीवन में जब कोई मार्ग नहीं सूझा, तो वह एक संत के आश्रम पहुँच गया और वहाँ सेवा माँगी। आश्रम वालों ने उसे गाय चराने का कार्य सौंपा, साथ ही कहा, “खाना खुद बनाओ, ठाकुर जी को भोग लगाओ, तभी पाओ।”

भाव से भरा पहला भोग और भगवान की कृपा

अढ़ैया ने ढाई किलो बाटी और आलू का भरता बनाया, और बड़े प्रेम से ठाकुर जी को भोग लगाने को कहा “गुरुदेव के ठाकुर, पधारो।” न मंत्र, न विधि – सिर्फ भावनाएँ थीं। और वही हुआ जिसकी कल्पना नहीं की जा सकती स्वयं श्रीराम जी प्रकट हुए, मेघ श्याम वर्ण, धनुष-बाणधारी।

“आप कौन हैं?” अढ़ैया ने पूछा।

“तुमने गुरुदेव के ठाकुर को बुलाया था, वही हम हैं।”

हर दिन एक नया आगमन – पूरा रामदरबार

अब तो यह सिलसिला चल पड़ा। रोज अढ़ैया ढाई किलो अपने लिए और ढाई किलो भगवान के लिए भोजन बनाता। भगवान हर दिन आते, और एक-एक कर सिया जी, लक्ष्मण जी, हनुमान जी, भरत, शत्रुघ्न सभी पधारने लगे। अढ़ैया भी हर बार आटा बढ़ाता जाता।

एक दिन भगवान ने कहा, “आज तुम हमें अपने हाथ से बना कर पाओ। हम स्वयं खाएंगे।” सिया जी बाटी बना रही थीं, हनुमान जी उपले ला रहे थे, लक्ष्मण जी चूल्हा जला रहे थे पूरा रामदरबार सेवा में लग गया।

गुरुदेव का आश्चर्य और ईश्वर की लीला

जब अढ़ैया ने यह सब गुरुदेव को बताया, तो उन्हें विश्वास न हुआ। वे स्वयं आश्रम पहुँचे वहाँ उन्होंने भगवान राम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न, सिया जी और हनुमान जी को सेवा करते देखा। प्रभु ने कहा, “जो ज्ञानी है, वह हमें तर्क से नहीं पा सकता। लेकिन जो सरल है, उस पर हम द्रवित हो जाते हैं।”

सीता जी का स्पर्श और भक्त का साक्षात्कार

भोजन के बाद सिया माता ने स्वयं अपने करकमलों से अढ़ैया को प्रसाद दिया। वह प्रसाद नहीं, बल्कि त्रिगुणमल नाश और सच्चिदानंद का साक्षात्कार था।

सरलता ही सच्ची भक्ति है

यह कथा हमें सिखाती है कि भगवान को पाने के लिए न तामझाम चाहिए, न बड़ी बड़ी विद्वता केवल एक सच्चा भाव, निष्कपटता और सेवा की भावना चाहिए। भक्त अढ़ैया जी की ढाई किलो भक्ति ही उनके लिए भगवान को खींच लायी।

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