भारत की संत परंपरा में महाराष्ट्र की भूमि विशेष रूप से पुण्यभूमि रही है। इसी भूमि पर एक ऐसे संत ने जन्म लिया, जिनका नाम चोखा मेला था एक गृहस्थ संत, परंतु त्याग, वैराग्य और अनुराग के सर्वोच्च शिखर पर प्रतिष्ठित। यह कहानी सिर्फ भक्ति की नहीं, भगवान और भक्त के बीच के आत्मिक संबंध की भी है, जहाँ जाति, कर्म या सामाजिक स्थिति नहीं केवल प्रेम की भाषा बोलती है।
चोखा मेला का निष्कलंक प्रेम
चोखा मेला जी साधारण जीवन जीते थे। वे मेहनत करके अर्थ कमाते और भगवान विट्ठल के लिए सब्ज़ी आदि अर्पित करने मंदिर जाया करते थे। एक दिन उन्होंने कुछ सुंदर, बड़े केले देखे और सोचा कि यह विट्ठल भगवान को अर्पण करें।
परंतु मंदिर के द्वारपालों ने उन्हें मंदिर में प्रवेश नहीं करने दिया। “क्या दो-चार बार नाम लेने से भगवान तुम्हारे प्रसाद को ग्रहण कर लेंगे?” कहकर उन्होंने चोखा मेला को धक्का दे दिया।
प्रेम में चोट, लेकिन अहं नहीं
इस अपमान से चोखा मेला को कोई क्रोध नहीं हुआ। वह एकांत में जाकर प्रभु से बात करने लगे, “प्रभु, आपने मुझे ऐसी जाति में क्यों जन्म दिया जहाँ मेरे द्वारा लाया गया प्रसाद आपको स्वीकार नहीं? क्या आप में इतनी शक्ति नहीं कि इसे बदल सकते?”
उन्होंने दरवाजा बंद कर लिया और निर्णय लिया कि अब यह शरीर प्रभु सेवा के योग्य नहीं।
भगवान की लीला
कुछ समय बाद, भगवान स्वयं दरवाजे पर आकर बोले, “भूख लगी है, दरवाजा खोलो।” भगवान ने खुद उनके लाए केले खाए और कहा, “आज जो स्वाद मिला है, वह मंदिर के भोग में भी नहीं आता।”
भगवान ने रुक्मणी जी को दिखाया कि भक्त के प्रेम से बढ़कर कोई वस्तु नहीं।
पलटी भगवान की सत्ता
जब यह बात मंदिर के पुजारियों और सेवकों को पता चली, तो उन्होंने दरवाजे पर ताला लगा दिया और भगवान ने कहा, “अब यह दरवाजा तब तक नहीं खुलेगा जब तक चोखा मेला जी खुद आकर न कहें कि खोलो।”
भगवान का आदेश था उन्हें पालकी में बैठाकर लाओ, और यदि ना बैठें तो चरण पकड़कर विनती करो।
भक्ति की विजय
वही लोग जिन्होंने चोखा मेला जी को धक्का दिया था, अब उनके चरण पकड़कर माफी मांगते हैं। चोखा मेला जी विट्ठल के चरणों में टूट जाते हैं, “प्रभु! आप कहाँ छुपे हुए थे?”
पालकी में बिठाकर जैसे ही चोखा मेला जी मंदिर आए और बोले, “खोलो प्रभु”, मंदिर के द्वार अपने आप खुल गए। जयकारों से गूंज उठा वह स्थल।
शिक्षा: प्रेम सबसे बड़ा साधन
यह कथा हमें सिखाती है कि भगवान को पाने का मार्ग जाति, कुल, तप या तपस्या नहीं केवल और केवल प्रेम है। प्रभु उसी के हैं जो केवल उनके लिए जीता है।





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