छाया में सुख की खोज यह प्रेरक आध्यात्मिक कथा बताती है कि संसार में दिखने वाला सुख केवल छाया है। सच्चा सुख आत्मबोध और सही दिशा से ही प्राप्त होता है। मनुष्य जीवन का सबसे बड़ा उद्देश्य सुख की प्राप्ति है। परंतु अधिकांश लोग जिस सुख को पाने के लिए जीवन भर दौड़ते रहते हैं, वह वास्तव में केवल छाया होता है। यह कथा उसी गहरे सत्य को उजागर करती है।
धन और सुख की लालसा
एक व्यक्ति धन की तीव्र इच्छा में डूबा हुआ था। वह मानता था कि यदि उसे धन मिल जाए, तो जीवन के सारे कष्ट समाप्त हो जाएंगे। उसी समय राजा के महल में एक घटना घटी, जिसने उसके जीवन की दिशा बदल दी।
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रानी का रत्नजटित हार और राजा की घोषणा
राजा की रानी का एक अत्यंत बहुमूल्य हार था, जिसमें लाल मणियाँ जड़ी थीं। एक दिन एक बाज की दृष्टि उस हार पर पड़ी। वह हार को अपने पंजों में उठाकर उड़ गया और दूर जाकर एक खजूर के पेड़ पर टांग दिया।
रानी उस हार को अपने सुख का कारण मानती थी। हार के खो जाने से वह अत्यंत दुखी हो गई। तब राजा ने घोषणा करवाई—
“जो भी व्यक्ति सूर्यास्त तक यह हार ढूंढकर ले आएगा,
उसे उसकी मनचाही वस्तु प्रदान की जाएगी।”नदी में छाया का भ्रम
यह सुनकर वह व्यक्ति हार की खोज में निकल पड़ा।
खोजते-खोजते वह एक नदी के किनारे पहुँचा। पानी में उसे वही हार दिखाई दिया, जैसा बताया गया था।बार-बार असफल प्रयास
वह तुरंत नदी में कूद पड़ा, पर उसके हाथ केवल कीचड़ लगा।
पानी शांत हुआ तो हार फिर दिखाई दिया।
वह फिर कूदा… फिर खाली हाथ निकला।यह क्रम कई बार दोहराया गया।
हार दिखता रहा, पर हाथ नहीं आया।
महात्मा का आगमन और सत्य का उद्घाटन
शाम होने लगी। तभी एक महात्मा वहाँ से गुजर रहे थे।
उन्होंने उस व्यक्ति की बेचैनी देखी और पूछा
“भैया, आप क्या खोज रहे हैं?”
उस व्यक्ति ने कहा
“मैं सुबह से इस हार को ढूंढ रहा हूँ, पर मिल नहीं रहा।”
महात्मा मुस्कुराए और बोले
“यदि हार पानी में होता, तो अब तक मिल चुका होता।”
छाया और वास्तविकता का भेद
महात्मा ने पीछे मुड़कर खजूर के पेड़ की ओर संकेत किया और कहा
“देखो, हार वहाँ ऊँचाई पर टंगा है।
जो तुम पानी में देख रहे हो, वह केवल उसकी छाया है।”
उन्होंने आगे समझाया
“छाया को पकड़ने के लिए जीवन भर कूदते रहो,
असली वस्तु कभी हाथ नहीं आएगी।”
उसी क्षण उस व्यक्ति को बोध हो गया।
कथा का आध्यात्मिक अर्थ
महात्मा ने गूढ़ सत्य बताया
- हमारी बुद्धि ही रानी है
- सुख रूपी हार हमने खो दिया है
- मन संसार रूपी नदी में उतरकर भोगों में सुख खोजता है
- जो सुख दिखता है, वह केवल छाया है
सही दिशा का महत्व
जब कोई संत या गुरु मिलता है,
तो वह कहता है
“नीचे मत देखो,
ऊँचाई की ओर देखो,
मूल की ओर देखो।”कथा से मिलने वाली सीख
इस प्रेरक कथा से हमें यह शिक्षा मिलती है
- संसार के भोगों में दिखने वाला सुख स्थायी नहीं होता
- सच्चा सुख आत्मबोध और ईश्वर-स्मरण में है
- सही मार्गदर्शन जीवन की सबसे बड़ी संपत्ति है
- छाया छोड़कर मूल की ओर देखने से ही शांति मिलती है
निष्कर्ष
मनुष्य जीवन भर सुख खोजता रहता है,
पर जब तक उसकी दृष्टि ऊपर नहीं जाती,
तब तक वह केवल छाया में ही भटकता रहता है।सच्चा सुख बाहर नहीं, भीतर है।
छाया नहीं, मूल को पहचानो।





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