भक्त हरपाल जी की कथा: जब भगवान को भी देना पड़ा चोरी में साथ

भक्त हरपाल जी की कथा: जब भगवान को भी देना पड़ा चोरी में साथ

भक्त हरपाल जी की कथा: जब भगवान को भी देना पड़ा चोरी में साथ

जानिए भक्त हरपाल जी की भक्ति और भगवान के प्रति उनके अद्भुत समर्पण की कहानी। यह प्रेरणादायक कथा आपके मन को छू जाएगी।

भारतीय भक्ति परंपरा में ऐसी कई कहानियाँ हैं जहाँ भगवान ने अपने भक्तों की भक्ति और सेवा से प्रसन्न होकर स्वयं अवतार लिया। ऐसी ही एक अत्यंत हृदयस्पर्शी और प्रेरणादायक कथा है भक्त हरपाल जी की, जिन्होंने संत सेवा का व्रत लेकर न केवल अपना सर्वस्व समर्पित कर दिया, बल्कि भगवान श्रीकृष्ण को भी दर्शन देने के लिए विवश कर दिया।

भक्त हरपाल जी के प्रारंभिक जीवन और सेवा-व्रत

हरपाल जी एक साधक थे जो भजन, साधना, और कथा श्रवण में रत रहते थे। विवाह के विषय में उन्होंने शर्त रखी थी कि विवाह उसी कन्या से करेंगे जिसका भाव और भक्ति भगवान के प्रति वैसा ही हो जैसा उनका है। संयोग से उन्हें एक ऐसी पत्नी मिली जिसने यह व्रत लिया था कि वह उसी पुरुष से विवाह करेगी जो प्रतिदिन 1000 संतों को भोजन कराए।

विवाह हुआ और हरपाल जी ने वचनबद्ध होकर प्रत्येक दिन 1000 संतों को भोजन कराना आरंभ किया। उन्होंने घर का पुराना धन लगा दिया, लेकिन जब धन समाप्त हो गया, तो कर्ज लेना शुरू किया। बाद में जब कर्ज लौटाना संभव न हुआ, तब उन्होंने चोरी करनी शुरू की लेकिन केवल उस उद्देश्य से कि संत सेवा न रुके।

चोरी नहीं, सेवा का यज्ञ

हरपाल जी किसी गरीब या सामान्य व्यक्ति के यहाँ नहीं जाते थे। वे संपन्न लेकिन सेवा से विमुख लोगों के घर जाकर खाद्य सामग्री और आभूषण चुराते थे। उनका एक ही उद्देश्य था संत सेवा को निरंतर बनाए रखना।

जब कोई उपाय शेष न रहा तो उन्होंने निर्णय लिया कि किसी अमीर सेठ को लूटेंगे और उससे मिली राशि से कई वर्षों की सेवा सुनिश्चित करेंगे। तभी मार्ग में ठाकुर श्रीकृष्ण स्वयं सेठ बनकर आए और रुक्मिणी जी को सेठानी बनाकर हरपाल जी के सामने प्रस्तुत हुए।

जब भगवान को करनी पड़ी चोरी सहन

भगवान ने हरपाल जी की परीक्षा ली। हरपाल जी ने सेठ और सेठानी (भगवान और रुक्मिणी जी) को मार्ग दिखाने के बदले “भोजन व्यवस्था हेतु धन” माँगा और फिर जंगल में उन्हें लूट लिया। भगवान के सभी गहने उतरवा लिए यह तक कि उनकी उंगली की अंगूठी भी माँगी।

जब हरपाल जी ने वह अंगूठी निकालने का प्रयास किया जो निकल ही नहीं रही थी, तब भगवान ने शंख, चक्र, गदा, पद्म धारण कर अपने दिव्य रूप में दर्शन दिए। रुक्मिणी जी भी प्रकट हुईं। दोनों ने हरपाल जी को अपने अंक में भर लिया।

निष्कर्ष और संदेश

भगवान बोले, “हरपाल, तुमने अपने लिए कुछ नहीं लिया। तुमने उन लोगों को पुण्य बाँट दिया जो कभी संत सेवा नहीं करते थे। हम तुमसे प्रसन्न हैं। जब तक तुम जीवित रहोगे, तुम्हारे यहाँ संत सेवा के लिए कभी अभाव नहीं होगा।”

भगवान ने उनके गृह को अलंकारों और आभूषणों से भर दिया। बाद में उन्होंने हरपाल जी की पत्नी को भी दर्शन दिए।

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