राजवैभव से परिपूर्ण एक जीवन जिसमें भक्ति और साधु संग का कोई स्थान नहीं था, वहीं एक दिव्य परिवर्तन की अलौकिक कथा प्रारंभ होती है। यह कथा है राजा अंगद जी की, जिनका हृदय प्रारंभ में नास्तिकता की गहराइयों में डूबा हुआ था। परंतु सदगुरु की कृपा और भगवत प्रेमी पत्नी के सत्संग से ऐसा रूपांतरण हुआ कि वे अंततः एक महाभागवत संत के रूप में प्रतिष्ठित हो गए।
इस कथा में:
राजमहल में भक्ति का अभाव
अंगद जी स्वभाव से पूर्णतया नास्तिक थे। उनका जीवन राजसी ऐश्वर्य में व्यतीत होता था, जहाँ संतों का प्रवेश तक वर्जित था। सत्संग, भजन या भगवद चर्चा का कोई नामोनिशान नहीं था। वहीं उनकी पत्नी, एक सच्ची भागवत थीं। उनके मायके में संत सेवा, गुरु भक्ति और सत्संग का निरंतर प्रवाह था। विवाह के पश्चात जब उन्होंने अपने ससुराल में भक्ति विहीन वातावरण देखा, तो उनका अंतरमन संत वियोग से व्याकुल हो उठा।
संतों का पहला आमंत्रण
उन्होंने अपने मायके पत्र लिखकर प्रार्थना की कि सदगुरुदेव कृपा कर उनके घर पधारें। जब संत आए, रानी ने श्रद्धा से उनका पूजन किया, चरणामृत लिया और सेवा में लीन हो गईं। तभी अंगद जी वहाँ पहुंचे और क्रोध में संतों का अपमान कर बैठे। गुरुदेव मौन भाव से उठकर चल दिए। रानी के लिए यह असह्य हो गया। उन्होंने प्रतिज्ञा ली कि जब तक उनके गुरुदेव का मान-सम्मान नहीं होगा, वे अन्न जल और वार्तालाप तक नहीं करेंगी।
भक्ति की ओर पहला झुकाव
पत्नी से अत्यंत प्रेम करने वाले अंगद जी भीतर से टूट गए। उन्होंने नम्रता से पूछा कि वे प्रसन्न कैसे होंगी। उत्तर मिला कि मेरे गुरुदेव को पुनः आमंत्रित कीजिए, उन्हें भोग लगवाइए और चरणामृत लीजिए। पत्नी की प्रसन्नता के लिए अंगद जी गुरुदेव के पास गए। संतों ने तनिक भी विलंब नहीं किया और सहर्ष उनके साथ चल दिए।
नाम का पहला प्रभाव
इस बार अंगद जी ने स्वयं भोग अर्पित किया, चरण धोए और चरणामृत लिया। उसी क्षण उनके अंतर्मन में एक नई ऊर्जा का संचार हुआ। विचार आया कि मैं कितना नास्तिक था और फिर भी ये संत मुझे प्रेमपूर्वक स्वीकार कर रहे हैं। यहीं से उनका चित्त धीरे धीरे भगवान की ओर आकर्षित होने लगा।
राजा से रसिक भक्त की ओर अग्रसर
अब अंगद जी ने ठाकुर सेवा को अपना कर्तव्य बना लिया। बिना भोग लगाए अन्न नहीं ग्रहण करते। संतों को बुलाकर भोजन कराते। उन्होंने चार सेवक नियुक्त किए जिनका कार्य था, जहाँ कहीं भी कोई संत मिलें, उन्हें ससम्मान घर आमंत्रित करें। पत्नी की भक्ति अब अंगद जी की जीवनशैली बन चुकी थी।
एक बार युद्ध में उन्होंने एक राजा को पराजित कर उसका मुकुट प्राप्त किया, जिसमें एक सौ एक अनमोल हीरे जड़े थे। एक हीरा तो इतना दुर्लभ था कि उसका मूल्य संपूर्ण खजाने से अधिक था। अंगद जी ने वह मुकुट श्री जगन्नाथ जी को अर्पित कर दिया। जब राजा ने उसे वापस माँगा, तो अंगद जी ने उत्तर दिया कि अब वह प्रभु का है। राजा ने षड्यंत्र रचा और अंगद जी की बहन, जो भोजन बनाती थी, उसे धन का लोभ देकर भोजन में विष मिलाने को कहा।
भक्ति की शक्ति और विष को हरने वाला प्रसाद
अंगद जी जब भोजन करने बैठे और अपनी भानजी को न देखा, तो भोजन से विरत हो गए। यह वात्सल्य देखकर बहन का हृदय पिघल गया। वह रोती हुई बोली कि भैया भोजन मत करना, उसमें विष मिला है। अंगद जी मुस्कुराए और बोले कि अब यह ठाकुर जी का प्रसाद है, इसमें विष नहीं केवल कृपा है। उन्होंने वह भोजन ग्रहण किया और उन्हें कुछ भी नहीं हुआ।
आज अंगद जी का जीवन इस बात का प्रमाण है कि सत्संग और गुरु कृपा किसी भी आत्मा को भगवान के चरणों में पहुँचा सकती है। जो कभी नास्तिक थे, वे आज ठाकुर सेवा, संत सम्मान और भक्ति भाव के पर्याय बन गए।
उनका जीवन यह सिखाता है
“जब पत्नी संतप्रेमी हो और गुरुदेव कृपालु हों, तो पत्थर भी भगवान के पथ का दीप बन सकता है।”
श्री अंगद जी महाभागवत की जय
एक विषैली परीक्षा
एक युद्ध में अंगद जी ने 101 हीरे जीते। सबसे अनमोल हीरा उन्होंने भगवान जगन्नाथ को अर्पण कर दिया।
राजा को यह बात बुरी लगी। वह ईर्ष्या से जल उठा।
“उसे मार देना चाहिए… लेकिन खुलेआम नहीं।”
रसोई बनाने वाली को बुलाया — जो अंगद जी की सगी बहन थी।
“तुम जितना धन चाहो, मिलेगा। बस एक काम कर दो – भोजन में विष मिला दो।”
बहन ने विष मिलाया।
अंगद जी ने भोजन ठाकुर जी को अर्पण किया और जैसे ही थाली लेकर बैठे, बोले,
“आज मेरी भांजी कहाँ है? मैं उसके साथ ही खाऊंगा।”
भांजी को छिपा दिया गया था — ताकि वह भोजन न करे।
बहन का मन कांप उठा।
“भैया, मत खाना। इसमें जहर है। मैंने डाला है। राजा ने कहा था। मैं भ्रम में थी।”
अंगद जी शांत थे।
“मैंने ठाकुर जी को भोग लगाया है। अब वह विष नहीं, उनका प्रसाद है।”
और अंगद जी ने वह प्रसाद पूरी श्रद्धा से खा लिया।
पर कुछ नहीं हुआ।
राजा को जब खबर मिली, वह और भयभीत हो गया — “जो विष को पचा जाए, उसे कोई क्या हराए?”
उपसंहार: जीवन का बोध
वो अंगद जी, जो कभी संतों को देखना नहीं चाहते थे — अब उनकी आँखें संतों के लिए हरपल नम रहती थीं।
वे कहते,
“श्रद्धा से बड़ा कोई रक्षक नहीं। और भोग से बड़ा कोई विष नहीं, यदि वह ईश्वर को अर्पित न हो





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