स्वामी विवेकानंद की यह प्रेरणादायक कथा एक आलसी व्यक्ति के माध्यम से सिखाती है कि सच्ची संपत्ति शरीर और कर्म में है, आलस्य में नहीं। अवश्य पढ़ें।
आलस्य से आत्मबोध तक: एक जीवन बदल देने वाली कथा
एक समय की बात है। एक बड़ा आलसी व्यक्ति था। उसका जीवन केवल सोने, खाने और बिस्तर पर पड़े रहने तक सीमित था। कोई उससे काम की बात कर देता, तो मानो उस पर पहाड़ टूट पड़ता। उसके पास काम न करने के लिए एक मजबूत बहाना था पिता द्वारा छोड़ी गई अपार संपत्ति।
वह सोचता था,
“मेरे करने से क्या होगा? समुद्र में एक लोटा पानी डालने से क्या फर्क पड़ता है?”
धन का घमंड और कर्म से दूरी
उसके घर के सामने ही रामकृष्ण मठ था। घरवालों के अत्यधिक दबाव पर कभी-कभी वह वहां प्रवचन सुनने चला जाता, लेकिन मन से नहीं। भीतर कहीं भी बदलाव की इच्छा नहीं थी।
समय बदला।
जो धन कभी अंतहीन लगता था, वह धीरे-धीरे समाप्त होने लगा।
बड़ा घर → छोटा घर → झोपड़ी।
लेकिन आलस्य अब भी वैसा ही था।
आत्मचिंतन की शुरुआत
एक दिन वह लेटे-लेटे अपने माता-पिता और बहनों को मेहनत करते देख रहा था। उसी क्षण उसके मन में विचार आया—
“मैंने अपना जीवन यूँ ही बिता दिया। अब कुछ करना चाहिए।”
वह रामकृष्ण मठ पहुँचा और स्वामी विवेकानंद से एकांत में मिलने का समय माँगा।
स्वामी विवेकानंद से संवाद
स्वामी विवेकानंद ने सहज मुस्कान के साथ पूछा,
“कहो भाई, हम तुम्हारी क्या सहायता कर सकते हैं?”
उस व्यक्ति ने कहा,
“मेरे पास समय नहीं है। मैं जल्दी से जल्दी धनवान बनना चाहता हूँ।”
स्वामी विवेकानंद मुस्कुराए और बोले,
“मैं तुम्हें दान से अमीर नहीं बना सकता, लेकिन एक तरीका है।”
शरीर की असली कीमत
वे उसे अस्पताल ले गए और बोले,
“तुम्हारे पास दो आँखें हैं। एक आँख दान कर दो, लाखों रुपये मिल जाएंगे।”
वह घबरा गया
“नहीं! मैं एक आँख से कैसे जीऊँगा?”
फिर कहा गया
“तो एक किडनी बेच दो।”
उसने तुरंत मना कर दिया।
सबसे बड़ा सत्य
अंत में स्वामी विवेकानंद ने गंभीर स्वर में कहा
“मैंने बैठे-बैठे तुम्हारे शरीर के अंगों को करोड़ों का सिद्ध कर दिया।
फिर भी तुम खुद को गरीब कहते हो?”
उन्होंने आगे कहा
“दो ही रास्ते हैं
- अपने अंग बेचकर धनवान बनो
- या जो ईश्वर ने दिया है, उससे कर्म करके धनवान बनो
तीसरा कोई रास्ता नहीं।”
जीवन की सबसे बड़ी सीख
उस व्यक्ति की आँखें खुल गईं।
उसे समझ आ गया कि सच्ची गरीबी धन की नहीं, सोच की होती है।
निष्कर्ष
यह कथा हमें सिखाती है कि
- आलस्य सबसे बड़ा शत्रु है
- शरीर स्वयं में अनमोल संपत्ति है
- मेहनत और कर्म ही सच्चा धन है
- समय रहते जाग जाना ही बुद्धिमानी है
जो मिला है, उसी से कर्म करो यही स्वामी विवेकानंद का संदेश है।





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