राजा नृग की अद्भुत कथा जानिए, जिसमें अपार दान के बावजूद भगवान का नाम न जपने से उन्हें गिरगिट की योनि मिली। यह कथा नाम जप की महिमा सिखाती है।
सनातन धर्म में दान, यज्ञ, तप और पुण्य कर्मों का बड़ा महत्व बताया गया है। लेकिन श्रीमद्भागवत और संत वाणी यह भी स्पष्ट करती है कि यदि इन सबके साथ भगवान का नाम स्मरण नहीं है, तो सब निष्फल हो सकता है। द्वारिका में घटित राजा नृग की कथा इसी गूढ़ सत्य को प्रकट करती है।
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द्वारिका में गिरगिट और भगवान श्रीकृष्ण का आगमन
एक दिन द्वारिका में भगवान श्रीकृष्ण के पुत्र खेलते-खेलते प्यास लगने पर एक कुएँ के पास पहुँचे। वहाँ उन्होंने देखा कि कुएँ के भीतर एक पर्वत के समान विशाल गिरगिट फँसा हुआ है।
सूत और चमड़े की रस्सियों से खींचने का प्रयास किया गया, परंतु वह बाहर नहीं आ सका।
जब यह समाचार द्वारिकाधीश भगवान श्रीकृष्ण तक पहुँचा, तो वे स्वयं वहाँ आए और अपने बाएँ हाथ से ही गिरगिट को बाहर खींच लिया।
गिरगिट से तेजस्वी महापुरुष का प्रकट होना
भगवान के स्पर्श मात्र से वह गिरगिट टूट गया और उसके भीतर से एक तेजस्वी महापुरुष प्रकट हुए।
भगवान ने पूछा
हे देवपुरुष, आप कौन हैं? और आपको यह गिरगिट की योनि कैसे प्राप्त हुई?
तब उस पुरुष ने अपना परिचय दिया
राजा नृग का परिचय और अपार दान
उन्होंने कहा
“प्रभु, मैं इक्ष्वाकु वंश का चक्रवर्ती सम्राट राजा नृग हूँ। मैंने जीवन भर अपार दान किए—
- असंख्य कपिला गौओं का दान
- स्वर्ण, रत्न, हाथी, घोड़े, भूमि, वस्त्र
- कुएँ, बावड़ियाँ, यज्ञ और कन्यादान
मेरे दान की गणना पृथ्वी के कणों और आकाश के तारों से भी अधिक थी।”
एक छोटी भूल और गिरगिट की योनि
राजा नृग ने बताया कि एक बार एक ऐसी गौ दान में चली गई जो उस ब्राह्मण की थी, जो दान स्वीकार नहीं करता था।
विवाद हुआ, पर दोनों ब्राह्मणों ने गौ लौटाने या अन्य गौ स्वीकार करने से इनकार कर दिया।
यह ब्राह्मण अपराध बन गया।
यमराज ने उनसे पूछा
“पहले पाप का फल भोगोगे या पुण्य का?”
राजा नृग ने पाप का फल पहले भोगने की इच्छा की, और उन्हें गिरगिट की योनि मिली।
दान बहुत, नाम नहीं – यही मूल कारण
राजा नृग ने कहा
“प्रभु, मैंने सब कुछ किया, लेकिन भगवान का नाम जप नहीं किया।
यही मेरी सबसे बड़ी चूक थी।”
संत वाणी कहती है
कोटि धर्म व्रत निगम रटी, विधि सो करे बनाई
एक नाम बिनु कृष्ण के, सब अधि होए जाई
अर्थात करोड़ों धर्म, व्रत, यज्ञ भी हरि नाम के बिना व्यर्थ हैं।
अजामिल और राजा नृग का अंतर
- राजा नृग: महादानी, पर नाम जप नहीं → गिरगिट बने
- अजामिल: महापापी, पर अंत में “नारायण” नाम उच्चारण → वैकुंठ प्राप्ति
यह सिद्ध करता है कि नाम का प्रभाव दान से भी अधिक है।
राजा नृग के देवलोक जाने के बाद भगवान श्रीकृष्ण ने द्वारिका वासियों से कहा
- ब्राह्मण से कभी द्वेष न करो
- वे क्रोध करें, श्राप दें, फिर भी नमस्कार करो
- मैं स्वयं तीनों समय ब्राह्मणों को प्रणाम करता हूँ
यह शिक्षा आज भी उतनी ही प्रासंगिक है।
निष्कर्ष
- दान, तप, यज्ञ आवश्यक हैं
- लेकिन भगवान का नाम सर्वोपरि है
- बिना नाम के सब पुण्य ढँक जाते हैं
- नाम से ही भवसागर पार होता है
राधा-कृष्ण नाम जपो, वही सच्चा साधन है




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