एक गहरी आध्यात्मिक कथा जो सिखाती है कि कर्म से अधिक महत्वपूर्ण उसका उद्देश्य होता है। उद्देश्य बदलते ही पाप भी पुण्य बन जाता है।
जीवन में हम जो भी कर्म करते हैं, उसका फल अवश्य मिलता है। परंतु बहुत कम लोग यह समझ पाते हैं कि कर्म से अधिक महत्वपूर्ण उसका उद्देश्य होता है।
जब उद्देश्य बदल जाता है, तब वही कर्म पाप से पुण्य बन जाता है। यह कथा इसी गहरे सत्य को प्रकट करती है।
दुष्ट स्वभाव वाला व्यक्ति और उसका जीवन
एक व्यक्ति अत्यंत दुष्ट स्वभाव का था।
जंगल में गडासा लेकर खड़ा रहता।
जो भी उधर से निकलता महात्मा हों या गृहस्थ
उनका धन, डंडा, कमंडल, जो कुछ मिले, छीन लेता।
मारना, लूटना, हिंसा करना उसका स्वभाव बन चुका था।
एक महापुरुष का साक्षात्कार
एक दिन एक महान तपस्वी, भजनानंदी और त्यागी संत उस मार्ग से निकले।
ऐसे संत जिनके दर्शन मात्र से पाप नष्ट हो जाते हैं
“संत दर्शन जिमि पातक हरे, बड़े भाग पाइब सत्संगा।”
संत ने उस व्यक्ति को समझाया
“तेरी दुर्गति होगी, यह मार्ग विनाश का है।”
उनके तपोबल से निकले शब्द सीधे उस व्यक्ति के हृदय में उतर गए।
उसके भीतर भय और पश्चाताप जाग उठा।
पश्चाताप और शिष्य बनने की इच्छा
वह संत के चरणों में गिर पड़ा
“महाराज, मैंने बहुत पाप किए हैं।
कृपया कोई उपाय बताइए, मुझे अपना शिष्य बना लीजिए।”
संत बोले
“ऐसे ही शिष्य नहीं बनाया जाता।”
परीक्षा और सूखी लकड़ी का प्रतीक
संत ने उसे एक सूखी लकड़ी दी और कहा
“जब यह लकड़ी हरी हो जाए, इसमें अंकुर फूट आए,
तब समझना कि तुम निष्पाप हो गए हो।
तभी मेरे पास लौटना।”
वह व्यक्ति संत की आज्ञा लेकर चल पड़ा।
बरगद का वृक्ष और कठिन निर्णय
मार्ग में उसने एक विशाल बरगद का वृक्ष देखा।
वहीं रात्रि विश्राम का विचार किया।
उसी समय उसने देखा कि कुछ लोग गाँव पर आक्रमण की योजना बना रहे हैं।
उसके मन में विचार आया
“यदि ये लोग जीवित रहे, तो पूरा गाँव नष्ट हो जाएगा।”
उसने कठिन निर्णय लिया और चार आक्रमणकारियों को मार डाला।
उसका उद्देश्य इस बार स्वार्थ नहीं,
बल्कि पूरे गाँव की रक्षा था।
लकड़ी का हरा होना और संत के पास वापसी
उसने देखा
सूखी लकड़ी हरी हो चुकी थी, उसमें अंकुर निकल आए थे।
बिना किसी तीर्थ यात्रा के, बिना किसी बाहरी साधना के
केवल उद्देश्य के परिवर्तन से यह संभव हुआ।
वह तुरंत संत के पास लौट गया।
संत ने कहा
“पहले तुम स्वार्थ के लिए मारते थे, इसलिए वह पाप था।
अब तुमने सबकी रक्षा के भाव से किया,
इसलिए वह पाप नहीं बना।”संत बोले
“गृहस्थ वही कर्म करता है,
भक्त भी वही कर्म करता है।
अंतर केवल उद्देश्य का है।
- गृहस्थ अपने सुख के लिए करता है
- भक्त प्रभु की प्रसन्नता के लिए करता है”
कथा से मिलने वाली शिक्षा
इस कथा से हमें यह गहन सीख मिलती है
- कर्म से अधिक महत्वपूर्ण उसका उद्देश्य है
- उद्देश्य बदलते ही कर्म का फल बदल जाता है
- स्वार्थ से किया कर्म पाप बनता है
- प्रभु की प्रसन्नता के लिए किया कर्म साधना बन जाता है
- भगवत प्राप्ति ही समस्त धर्मों की पूर्ति है
निष्कर्ष
हम जो भी करते हैं
नौकरी, व्यापार, सेवा, परिवार
यदि उसका उद्देश्य प्रभु की राजी बन जाए,
तो वही जीवन साधना बन जाता है।क्रिया वही रहे,
बस उद्देश्य बदल दो
फल अपने आप बदल जाएगा।





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