राजमंत्री के पुत्र त्रिपुरदास जी की श्रीनाथ जी के प्रति निष्कलंक भक्ति की मार्मिक कथा, जिसमें राजवैभव खोकर भी प्रभु सेवा का त्याग नहीं किया। कैसे लाल रंग के मोटे कपड़े (मार्किन) से भगवान श्रीनाथ जी की सेवा ने उन्हें प्रेमविभोर कर दिया पढ़िए एक भक्त और भगवान के प्रेम की अनुपम गाथा।
इस कथा में:
त्रिपुरदास जी की भक्ति की जड़ें बचपन से
त्रिपुरदास जी का जन्म एक राजमंत्री के घर हुआ था, लेकिन बचपन से ही उनका मन श्री भगवान की भक्ति में रमा रहता। एक बार पिता के साथ गिरिराज जी के दर्शन हेतु गए, जहाँ श्रीनाथ जी के दिव्य रूप ने उन्हें ऐसा आकर्षित किया कि वे वहीं रुकने की हठ करने लगे।
पिता की मृत्यु और आध्यात्मिक बोध
पिता की आकस्मिक मृत्यु के बाद त्रिपुरदास जी ने श्रीनाथ जी की ओर देखा और भावविभोर होकर बोले — “अब आप ही मेरे पिता हैं, अब मेरा सबकुछ आप ही हैं।” उनके हृदय में प्रभु के प्रति पूर्ण समर्पण का भाव उत्पन्न हुआ।
वल्लभाचार्य जी से दीक्षा
श्रीनाथ जी की सेवा में लीन बालक को वल्लभाचार्य जी ने देखा और उनकी भावनात्मक गहराई से प्रभावित होकर उन्हें तत्काल दीक्षा दी और ब्रह्म-संबंध कराया।
राजमंत्री बने, फिर भी सेवक भाव
समय बीतने पर त्रिपुरदास जी को राजमंत्री बनाया गया। लेकिन उन्होंने संकल्प लिया कि जितना भी धन मिलेगा, वो प्रभु और संतों की सेवा में लगेगा। हर वर्ष श्रीनाथ जी के लिए रत्नजटित सुंदर सर्दियों के वस्त्र भेजने की प्रतिज्ञा ली।
दुष्टों के कहने पर यवन राजा ने उनकी सारी संपत्ति जब्त कर ली। यहाँ तक कि खाने को भी कुछ न बचा। सर्दी की ऋतु आई त्रिपुरदास जी रो पड़े: “मैं भूखा रह लूंगा, पर आपकी सेवा कैसे रुके प्रभु?“
घर में बस एक पुरानी पीतल की दवात बची थी। उसे बेचकर एक लाल रंग का मोटा मार्किन खरीदा और रोते हुए कहा “नाथ, यह आपके योग्य नहीं, लेकिन मेरे प्रेम का प्रतीक है।”
ठाकुर जी की लीला: जब प्रेम जीतता है
गोसाई जी के सेवक ने वह वस्त्र भंडारी को दिया, और श्रीनाथ जी ने उसका आदरपूर्वक उपयोग किया। लेकिन अगले दिन श्रीनाथ जी ठंड से कांपने लगे “मुझे ठंड लग रही है!” जब गोसाईं जी ने देखा कि त्रिपुरदास जी का वस्त्र नहीं उपयोग में आया, तुरंत उसे निकाला गया और श्रीनाथ जी को पहनाया गया। तभी ठाकुर जी मुस्कुरा उठे “अब ठंड नहीं लग रही।”
त्रिपुरदास जी कभी बिना चरणामृत के अन्न ग्रहण नहीं करते थे। एक दिन जब चरणामृत न मिला, तो उन्होंने उपवास का निश्चय किया। तभी एक 10 वर्षीय बालक स्वयं चरणामृत लेकर आया वो और कोई नहीं, स्वयं श्रीनाथ जी थे।
आप भक्ति की मूरत शबरी माता की कथा भी पढ़ सकते हैं।





Leave a Reply